Saturday, 26 December 2015

'' एक हमारा कल था ''


आज उलझकर बचपना बस किताबी हो गया
हाथों में मोबाईल टैबलेट ठाठ नबाबी हो गया ,

          '' एक हमारा कल था '' 

अभी तक है याद ताज़ी मौसम गुलाबी गाँव की
छपाछप खेलना बरसातों में कागदों के नाव की ,

भोर की सुनहरी किरणें ढलती सुहानी शाम की
नीम ,बबूल की दातून  सेंक सर्दियों के घाम की ,

चिंड़ियों की चहचहाट कागा के कांव-कांव की
नित्य भिनुसार नमन करना बुजुर्गों के पांव की ,

बसंती हवा की झरकन बरगद के घने छाँव की
सोंधी महक माटी की गन्ध बचपन के ठाँव की ,

ओसारों में डलीं खाटें लुत्फ़ चाँदनी के रात की
यादें बहुत हैं रूलाती गुज़री घड़ियों के बात की ,

संयुक्त परिजनों का क़स्बा दादू के चौपाल की
पक्के कुंवना का पानी चने,अरहर के दाल की ,

कच्चा रस, मटर की घुघुरी सरसों के साग की
वो स्वाद चोखा भऊरी पके गोहरे के आग की ,

चिन्ता फिकर ना जिम्मा न जहमत जवाल की
गुडे्-गुड़िया याद झूला वो निमिया के डाल की ,

लड़कपनी कुलांचें सखियां,अमुवा के बाग़ की
याद आती लगी कुर्ती आम,जामुन के दाग की ,

घर के विशाल अहाते,चौबारे में किये राज की
सिमट गयी हा ज़िन्दगी दो कमरों में आज की ,

अजीब आबो-हवा शहरी,काम की न काज़ की
लूटी जाये रोज आबरू बहन-बेटी के लाज की ,

                                              शैल सिंह