Saturday, 29 November 2014

'' ग़ज़ल ''

'' ग़ज़ल ''

महक से हो गई तर हमारी गली
उनके आने की आहट हवा दे गई,

जिस्म की डाल पर रंग चढ़ने लगे
बेसबर से नयन राह तकने लगे
ख़ुश्बू राहे-जुनूँ पर जहाँ ले गई ,

खुली आँखों में सपने संवरने लगे
रात भी दिन मुझे आज लगने लगे
शबे-तारीक में चांदनी जवां हो गई ,

हरा हर शज़र आवाजे-पा है हुआ
ख़िज़ाँ के फूलों पे सुर्ख़ी आने लगी
ख़ुशी लग कर गले से घटा हो गई ,

प्यार में जाने क्या सिलसिले ये हुए
कंपकपाये तो थे लब गिले के लिए
पास आकर क्यूँ जाने कहाँ खो गई ,

छाँह आग़ोश की पाये अरसा हुआ
नेह से बाँह में भर जब मन को छुआ
हर छुवन दर्द की अचूक दवा हो गई ,

लौट कर शाद घऱ यार आया मेरा
शाम सुरमई गुलाबी सवेरा हुआ
सरे-मिज़गाँ बिठा कर रवा हो गई ,

टूटकर शाख़ से यास थे हम-नफ़स 
सद-गुहर पा फ़िरोजां हुई शैल अब
जीस्त वीरां ताबिन्दा-पाईन्दा हो गई ।

अर्थ--
राहे-जुनूँ--पगलाए हुए रस्ते ,शबे-तारीक--अँधेरी रात ,
आवाजे-पा--पांव की आहट ,शाद--प्रसन्न ,सरे-मिज़गाँ--पलकों पर ,
रवा--प्रभावित ,यास--मायूस ,सद-गुहर--हजारों मोती ,फ़िरोजां--चमक ,
ताबिन्दा--चमकदार ,पाईन्दा--स्थाई ,
                                                              शैल सिंह