Tuesday, 22 July 2014

अनवार दिल पे सितम ढा रहे हैं


अनवार दिल पे सितम ढा रहे हैं


रात चाँदनी में नहाई हुई है
झिलमिल सितारे जगमगा रहे हैं
नागवार दिल को लगे ये नज़ारा
अनवार दिल पे सितम ढा रहे हैं।

नज़रों की खुराफ़ात खता दिल से हो गई
सदमा सिवा दिल पे जुदा तुमसे हो गई
कौन हूँ मैं तेरी क्या वाबस्ता तुझसे मेरा
सोच तरदीद तेरा निशात सहज़ हो गई ,झांकते हैं पलकों की बन्द झिर्रियों से
अबस यादों के गुस्ताख़ गुजरे ज़माने
यादों के पाँखी मन क़फ़स में फड़फड़ाये
रक़्स करते हैं जख़्म जवां हो पुराने ,

ये जलवे फिज़ा के ये शब की गहनाई
मंज़र वही पर रौनक़े-महफिल नहीं है
हसी ग़ुंचे वही सबा, पेशे गुलशन वही है
मगर जलवा-ए-नुरेज-अज़ल वो नहीं है ,आहिस्ता-आहिस्ता ये रात ढल रही है
रुख पे डाले नकाब चाँद छिप रहा है
आसमां के जुगनू सितारे सो गए सब
दिल बहलाने के वो सहारे खो गए सब ,

शेर --

गुजरे किस दौर से हैं फिर भी मुस्कराये
तख़लीफ़ कर हम खुद-बख़ुद गुनगुनाये
तंज कसते मजरूह दिल पे अहबाब सा
रेअसास जख्मों का रखा है दिल से लगाये ।

                                      शैल सिंह