Tuesday, 14 July 2015

सीख लिया जीने का गुर

  '' सीख लिया जीने का गुर ''

'' जबसे तन्हाई से यारी हुई
  ढूंढ लिया जीने का सुर
  तन्हाई से करके मोहब्बत
  सीख लिया जीने का गुर ''

ये तन्हाई ----

कभी विहँस शरच्चन्द्रिका सी दर्शन करवा देती दिव्य लोक के
कभी झकझोर परिहास से मटमैले लोक में छोड़ जाती तन्हाई
कभी यादों, सोचों का साम्राज्य खड़ा कर चीर देती है सन्नाटा
कभी मन के निर्मम, बोझल त्तम् को आलोक दिखाती तन्हाई  ,

कभी व्यथित कर देती अन्तर्, कभी नाभाष प्रफुल्लता भर देती
कभी निराशा के अंचल हर्षातिरेक से आशा की पूर्णिमा भर देती
कभी तन्हाई के नैराश्य जमीं पर सुख-दुःख के सरसिज बो देती
कभी राह सुझा जाती जीने की कभी झट धीरज संचित खो देती ,

कभी विलास की रानी बनकर मृत स्पन्दन में किसलय भर देती
कभी अलौकिक,अद्भुत संसार लेजा ऐसा मन मतवाला कर देती
कभी नयनों में खारा पानी कभी अविच्छिन्न उत्साह से भर देती
कभी समीर शीतल बन,एकाकी जीवन उपवन  सुरभित कर देती ,

ये जीवन के सांध्य प्रहर का पतझड़, सभी उन्मत्त बहारें लौट गईं
कुछ दिन सुख के घन छलका अब सुख की सारी चंचल  रैन गईं
अब नहीं नूतन कुछ होने वाला 'अपने' सब साथ छोड़कर चले गए
चिर शान्ति, विदारक आह, व्यथा की दाह पास छोड़कर चले गए ,

उम्र के सुने जर्जर तट का सुनसान किनारा, सौन्दर्य निहारे कौन
पीर अपरिमित ममता की वातसल्य की अब आलिंगन धारे कौन
गेह कवि की तन्हाई ,खिलते स्मृति ,कल्पना, भाव के सुमन यहाँ
वीराने मूक अकेलेपन की बनी सुहागन सिंगार सजाती मौन यहाँ,

कभी तो हताश,निराश,विषाद,अवसाद की ऊसरता मिटला देती
कभी जीवन सरिता की उद्गम बन मरुमय उर उर्वरा बना देती
कभी बाल संगिनी बन तन्हाई तन्हाई की नीरवता सहला जाती
कभी ख़ुशी का अलख जगाती कभी ज्वाला बन देह जला जाती ,

कभी तो कुत्सित भाव जगातीं कभी मन का कोलाहल पढ़ लेती
कभी कल्पना के पंक से पंकिल कविताओं की कड़ियाँ गढ़ देती
कभी समर्पित हो अभिव्यक्ति भंगिमा चुपचाप सृजित कर देती ,
कभी चुन-चुन कर भाव हृदय में मुक्त क्लान्त कवि के भर देती

कभी निर्वाक् वो अविचल भाव से कई सुख के आयाम जुटा देती
कभी खामोश सिमट सीने में उमग मधुऋतु की आस लगा लेती
कभी उफ़नती स्याही बन उत्साहित अनंत शब्द भंडार जुहा देती
कभी मन के व्याकुलता की आश्रय बन अरुण ध्वजा फहरा देती ।

                                                                               शैल सिंह