Saturday, 9 May 2015

'' किसानों की बेबसी ''

'' किसानों की बेबसी ''

ओ रे मेघा बरसकर बेमौसम
तूने कैसी क़हर बरपाई
ओला वृष्टि कर बेवक़्त तूने
की चौपट हा श्रम की कमाई ,

क्यों अकड़ में तूं अन्धा हुआ रे
मुर्दा हसरतों पे ऑंख डबडबाई
ताब में इतना पागल हुआ है तो जा
देख आ सूखी बंजर धरा की बिवाई ,

सपनों का आधार फसलों की पूंजी
क्यूँ ना क्षति से रूह तेरी कसमसाई
थी बेटी के हाथों की हल्दी जिस बूते
वो बल तोड़कर किया तूने धराशाई ,

गले फसरी लगाने को मजबूर कर दी
कहाँ गई तेरी भलमनसाहत भलाई
संवेदनाविहीन हुआ झमाझम बरसकर
क़र्ज़ कैसे चुकायेंगे तबाह कृषक भाई ।

गिरवी गहने ,घर बंधक उधारी की मार
दशा दीन हीन देख भी शरम नहीं आई
रंक फकीर बेबस बनाया रे मक्कार घन
देख ले अन्न की तूं भी दुर्दशा ओ कसाई ।