Monday, 9 February 2015

कहानी 'आपके लिए आपका खज़ाना '

                                                      'आपके लिए आपका खज़ाना '


     मैं घर छोड़कर जा रही हूँ , अपना और अपने बच्चों का ख़याल रखना . निशा बहुत ही मुलायमियत से यह बात कह कर बिना रोशन जी की तरफ मुख़ातिब हुए डग भरती हुई सर्र से उनके सामने से निकल गई .रोशन जी को इस बात का जरा भी इल्म नहीं हुआ कि निशा कहाँ,क्यों और किसलिए जा रही है,उन्होंने सोचा यह भी रोज की तरह धमकी का एक और अध्याय है जो प्रायः ही सुनने को मिलता है . पेपर पढ़कर आराम से उठे नहा,धोकर पूजा ,पाठ कर ऑफिस के लिए तैयार होने का उपक्रम करने लगे ,वे तैयार होकर ही नाश्ते की टेबल पर आते हैं पर निशा को घर में कहीं नहीं देखकर स्वयं रसोई में जाकर अपनी प्लेट लगाकर ले आये और इत्मीनान से नाश्ता करने लगे ,निशा ने पूरे दिन का खाना बनाकर ढंक दिया था ,ताकि कम से कम आज का दिन तो वे लोग आराम से काम चला लें . रुमाल और टाई के लिए उन्होंने पुनः आलमारी खोली ,अबोला के चलते वे आजकल खुद ही अपने कपड़े निकालते और पहनते हैं ,निशा के देने और कुछ कहने का इंतज़ार नहीं करते क्योंकि हर रात के बाद मनमुटाव की बारिस का यह नतीजा होता ,निशा के कुप्पा से सूजे हुए मुँह का जायका भी रोशन जी को कुछ आभास नहीं दिला पाता था ।
    आलमारी का पट खोलते ही एक सफेद लिफ़ाफ़ा उनके पैरों के पास आ गिरा ,जब उठाकर पुनः रखने की कोशिश की तो लिफाफे पर लिखे अक्षरों पर निग़ाह पड़ गई ,लिखा था , 'आपके लिए आपका खज़ाना ' इसे अवश्य पढ़ें । लिफ़ाफ़ा काफी वज़नदार था ,उन्होंने सोचा ऐसा क्या हैं इसमें जो इतना वज़नी और फूला-फूला लग रहा है । खोलकर पढ़ने की उत्सुकता ने उन्हें व्यग्र कर दिया और वे आलमारी का पट खुला का खुला छोड़कर आरामकुर्सी पर बरामदे में जा बैठे । अब ऑफिस को देर हो तो हो बला से ।   
       लिफ़ाफ़ा खोलकर देखा तो उनके लिए ख़त के रूप में एक बहुत बड़ा कई पन्नों का मज़मून था जिसमें निशा ने अपना जीवन वृतान्त लिखा था । बिना किसी सम्बोधन के पत्र स्पष्ट और सीधे सपाट शब्दों में उद्धृत था ,जो उनके हाथों में पंखे की हवा से फड़फड़ा रहा था । निशा ने शादी के बन्धन से लेकर अब तक साथ गुजारे हुए हर चरण का बेबाकी से उल्लेख  कर डाला था । पत्र का शुभारम्भ बड़ा ही दिलचस्प और मर्मस्पर्शी था ,कुछ इस तरह ---।
    आत्मलेखन मेरे पत्र का केन्द्रबिन्दु है ,भावनाओं का उद्वेग दबा नहीं पाई ,इसलिए घर की देहरी लांघने से पहले अपने कातर भावनाओं का शोता तुम्हारे लिए छोड़कर जा रही हूँ । जानते हो क्यों अपना अहसास जताने के लिए इन बेजुबां हर्फ़ों का सहारा लेना पड़ा ,क्यों कि तुम कभी मेरे अबोध और कोमल अहसासों को खुद समझ नहीं पाये । कहाँ से महसूस करवाना शुरू करूँ ।तुम्हारे संगत में आने के प्रथम चरण से मध्य से या उम्र के इस पड़ाव पर आकर ,जिसे इतने वर्षों तक पल-पल किन-किन परिस्थितियों में जिया या भोगा । तुम तो कभी मेरी अन्तर्वेदना को महसूस ही नहीं कर पाये कि मैं दरअसल तुमसे चाहती क्या हूँ ।हर दो दिन की ख़ुशी के बाद वही खामोश वातावरण ,और एक मैं उस दो दिन की ख़ुशी में हर पल हर लम्हा गुजारने की ख़्वाहिश रखने वाली ।      जैसे-जैसे रोशन जी एक-एक लाइनों का अवलोकन करते, आगे की लाइनों को पढ़ने की इच्छा बलवती होती जाती । पत्र पढ़ते-पढ़ते रोशन जी की इन्द्रियां कभी आन्दोलित तो कभी शिथिल हो जातीं तो कभी चेहरे का रंग फ़क पड़ जाता ,तो कभी मन ही मन बुदबुदा उठते .मन के भीतर एक शीशा सा क्षनका , निशा तुम्हारे अन्तस में गूँगे सैलाबों का इतना अम्बार ,मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि तुम अपने सपनों के संसार को छोड़ने का इतना ढृढ़ निश्चय कर क़दम इस तरह उठा लोगी  . फिर ऑंखें तटस्थ कर आगे पढ़ने लगे ।  
    तुम हमेशा आम जीवन की छोटी-छोटी बातों को भी मुद्दा बनाकर जिंदगी को बोझिल बनाने में कसर नहीं छोड़ते थे । हर छोटी-छोटी बात को समस्या प्रधान बना देते जो मुझे हमेशा झकझोरती कि मैं ग़लत कहाँ हूँ मैंने क्या कर दिया जो तुम्हारी इज्ज़त पर बन आई । जानते हो वह शायद तुम्हारे कसैले सोच की समस्याएं होती थीं और तुम उसका प्रतिकार मौन साधकर मुझे आहत करते थे ,संवादविहीन शस्त्र से वेंधते थे . जानना चाहोगे कि नेह बरसाने वाली आत्मा को कब-कब बहुत चोट पहुँची ,जब तुमने मेरे ईश्वर प्रदत्त क्रिया कलापों को प्रदर्शन कहा ,जब-जब मैंने तुम्हारा और बच्चों का अपने अनुकूल ख़याल रखा ,थोड़े में भी तुम लोगों को आकर्षक और सुव्यस्थित रखने की कोशिश की ,उसे भी तुमने लांछन लगाया मैं डॉमिनेटिंग हूँ ,मैंने अपनी सूझ-बूझ से कम आमदनी में कहीं से काट कपटकर कहीं जोड़कर शून्य से घर की बुनियाद को अगर समाज के मध्यम वर्ग जैसा स्थापित किया तो उसे भी तुमने कहा दिखावा करती हो ,जो कुछ भी करती हो अपनी ख़ुशी के लिए करती हो, जिससे मुझे कोई सरोकार नहीं  .  मेरा अपने श्रम से सुघड़ता और सलीके से सुरुचिपूर्ण रहन-सहन का तरीक़ा अपनाना भी तुम्हें नागवार गुजरता जिसमें तुम्हारा कोई पैसा खर्च नहीं होता था ,जिसमें तुम्हारी कोई पूँजी नहीं डूबती थी , बल्कि मैं अपना परिश्रम गंवाती थी  .  मेरी ऐसी व्यवस्थित जीवन शैली को भी तुमने दोषारोपित किया कि मैं तुम लोगों पर अपनी इच्छा थोपती हूँ ।
    मैंने कभी तुमसे या तुम्हारे बच्चों से किसी काम की उम्मीद नहीं की ना ही कभी कुछ थोपा ,बस मैं अपनी जिंदगी अपने अनुसार जीना चाहती थी , क्या इसमें भी तुम्हारा पैसा ख़र्च होता था  .मैंने अपने इस छोटे से पारिवारिक संसार को कुछ हद तक स्वयं के विवेक और हुनर से सजा संवार कर रखती थी ,वह भी तुम्हें अखरता था , क्या इसमें भी तुम्हारा पैसा ख़र्च होता था ।
        बहुत सारी छोटी-छोटी फुन्सियाँ तुमने मेरे शरीर में प्रत्यारोपित कीं अपने अरुचिकर स्वाद से ,जो  उम्र की इस दहलीज़ पर आकर फोड़े का आकार ले बैठीं  .जब दर्द असहनीय हुआ तो कदम जीने का सही रास्ता ढूंढने निकल पड़े अज्ञात पगडण्डियों पर ,शायद मुझे मेरी असली मंजिल मिल जाये किसी सुनसान वीराने में ।
       भारी मन से ख़त को दोनों हाथों में भींचे हुए रोशन जी आरामकुर्सी पर ही अधलेटे ऑंखें मूंदे हुए मंहगू को आवाज़ लगाये ,मंहगू जरा ख़ूब कड़कदार चाय बनाना बड़ी थकावट सी लग रही है  .मंहगू जो रोशन जी का घरेलु नौकर था आज दो दिन की छुट्टी के बाद पुनः वापस आया था ,वह अभी मेमसाहब की गैरहाजिरी से अनभिज्ञ था अन्यथा सोचता साहब को तो मेमसाहब के हाथ की चाय पसंद है हमें क्यों फ़रमा रहे हैं ।     
    मंहगू की आवाज पर रोशन जी की तन्द्रा भंग हुई साहब चाय, चाय की प्याली हाथों में लेकर धीरे-धीरे वो सिप करने लगे  . एक घूंट पीते  फिर कुछ शून्य में टटोलने लगते फिर ऑंखें मूंदकर कुछ सोचने लगते और बुदबुदाने लगते  . चाय ख़त्म कर चाय की प्याली नीचे ज़मीन पर रखकर फिर बेसब्र होकर पत्र पढने लगे  . निशा ने बड़ी ही साफ़गोई से मन के दरवाज़े खोल कर रख दिए थे । अनाड़ी से अनाड़ी भी शब्दों की अंतरंगता समझ सकने में सक्षम होता ।आगे  लिखा था ,
    वो माटी के मूरत क्या अब जानना चाहोगे कि तुम्हारे ख़ामोशी के दरवाजे को झुंझलाती कुण्डियों से क्यों खटखटाती थी, जानना चाहोगे कि तुम्हारी मौन खिड़कियों को आक्रोश से क्यों भड़भड़ाती थी ,क्योंकि तुम्हारे पास किसी तरह के भाव किसी तरह की अभिव्यक्ति समझने की क्षमता ही नहीं थी ,तुम्हें इशारे नहीं बता पाये ,तुम्हें आवरण में ढंके हाव-भाव समझ नहीं आये ,तुम्हें मन का नंगा नाच भी समझ नहीं आया ,जानते हो क्यों ? क्योंकि तुम ग़रीब मानसिकता के थे , एक पत्नी अपने पति से क्या चाहती है, प्यार भरा सानिध्य ,क्या तुमने उसे दिया  . तुम सचमुच नादान थे या ढीठ वाला अनजान बनकर जलाते रहे थे मेरे वज़ूद के आकार को ,मेरे आक्रोश और चिड़चिड़ेपन का कारण क्या है क्या उसे भी महसूस करने में पैसा ख़र्च होता था ।
  तुम्हारे घर में ,खुद के इर्द-गिर्द तमाम खुशियों का भण्डारण था ,पर तुम्हें कभी कुछ दिखाई नहीं दिया । सब कुछ अनदेखा कर बस ख़यालों के बवंडर में गोते लगाते हुए ना जाने कौन सा ताना-बाना बुनकर ताज़महल खड़ा करना चाहते थे  . अरे मैं भी तुम्हारी तरह अतीत की विसंगतियों और विषमताओं को कभी भूली नहीं पर,उसको लबादे की तरह ओढ़कर मैं कुछ सावित भी नहीं करना चाहती थी । तुम तो उस बदसूरत खोल से कभी बाहर निकले ही नहीं । जिससे मुझे स्फूर्ति और ऊर्जा मिलती थी ,तुम मेरी उन्हीं क्रियाओं पर ताला लगाने को कहते , मेरे जीने की पद्धति को समूल नष्ट करने को कहते  . तुम मुझे भी अपनी तरह गंभीरता की प्रतिमूर्ति बनाकर किस संग्रहालय में स्थापित करना चाहते थे । मुझे तारीफ़ की कमज़ोरी नहीं ,मुझे अच्छा बनने या अच्छा दिखने की चाहत नहीं ,मुझे धरातल से उठकर सीधे आसमान में जाने की तमन्ना नहीं , मैं जैसी दिखती हूँ या मुझे लोग जानते हैं वही मेरा अपना है ,वही मेरी अपनी पहचान है , मैं क्यों तुम्हारे द्वारा पहचानी जाऊँ  . तुम्हारी ज़िन्दगी में आने के बाद तो मैं अपना नाम तक भूल गयी अपना वज़ूद तक गिरवी रख दिया  . तुम तो सदा आत्मकेंद्रित रहे,ना जाने कौन सा आत्ममंथन करते रहे और मैं असन्तुष्ट नायिका निर्जीव मूर्ति की तरह तुम्हारे आगे-पीछे डोलती रही मधुर बोल सुनने के लिए ,तरसती रही भर नज़र प्रदर्शित होने के लिए , तुम तो कभी मेरी वो दुःखती रंग तक नहीं पकड़ पाये कि धमनियों में किस तरह की पीड़ा का प्रवाह हो रहा है ,तुम तो कभी भी मेरी चाहतों के बदले-बदले तेवर तक नहीं भाँप पाये  . एक घर में एक छत के नीचे एक दूसरे के साथ-साथ जिंदगी जीना ही पर्याप्त नहीं होता , वैसे भी तुम घर को एक सराय के सिवा घर समझे ही कब  .तुम्हारी तो कभी किसी चीज़ में रूचि थी ही नहीं , आख़िर तुम्हारे जीवन में ख़ुशियों का विद्रूप रंग ही क्यों था ,खंडहरनुमा बिचारों का टीला ही क्यों था । 
    तुमने कभी भला बुरा कहा नहीं ,कभी मुझे मारा पीटा भी नहीं पर ,जानते हो तुम्हारे चेहरे की भाव भंगिमा मौन भाषा की प्रतारणा किसी लाठी के प्रहार से कभी कम नहीं लगे , तुम्हारी शारीरिक चाल-ढाल की प्रतिक्रिया किसी हथियार से कभी कम नहीं लगे  .एक बात और जताना चाहूँगी ,जानते हो हम दोनों ही एक दूसरे को टोका टाकी करते थे पर मेरी टोक में तुम्हें और बच्चों को खुद से ढंग के रहन-सहन और घर को यथोचित तरीके से रखने की ताक़ीद होती थी और तुम्हारी टोक में  ' पर ' कतरने की , मैं तुम्हारे पैसों से आभूषण और परिधान अवश्य अर्जित की पर,मैं जानती हूँ कि उनमें दंश और क्लेश के कितने छेद थे अवसाद के कितने परिहास थे । क्या तुम अपनी ख़ुशी से वही कर्त्तव्य नहीं निभा सकते थे  . बहुत सारे दरकते मंसूबों का भण्डार है ज़ेहन में  .पढ़ते-पढ़ते तुम थक जाओगे,थोड़ा विश्राम करके फिर पढ़ लेना ,क्योंकि झिक-झिक करने वाला बहुत दूर जा चुका होगा इस नीड़ से ।
   आत्म हत्या कर नहीं सकती कायरता होगी,बाहर जाकर कोई उद्यम या संघर्ष कर नहीं सकती क्योंकि अबला नारी हूँ ,साध्वी सन्यासिनी बन नहीं सकती क्योंकि मुझमें वैराग्य नहीं । मैं निशा हूँ इसलिए निशा के अन्धेरे में अपने दुःख दर्द की कंदील रौशन कर आत्मलेखन के सहारे मन के उद्वेलनों को शांत करुँगी । ना मैं तुम्हें हृदय की मूक वाणी से कुछ समझा सकी ना तुम मेरे अन्तर के प्यास को समझ सके । मैं अपनी पहचान मिटा देती तो तुम ख़ुश होते मैं ' मेरा ' मार देती तो तुम खुश होते  ,मैं अपनी खनखनाती हुई हँसी,ठिठोली ज़ब्त कर लेती तो तुम खुश होते ,क्योंकि इसमें भी तुम्हारा पैसा खर्च होता था । रोशन जी पैसे से ख़ुशी नहीं खरीदी जा सकती ,शांति और सुकून नहीं ख़रीदे जा सकते । मैं रो नहीं सकती थी जबकि आँसू मेरे अपने थे ,उसे भी आपने कहा ब्लैकमेल करती हो । मैं कौन हूँ क्या हूँ कहाँ हूँ यह भी जानने का अधिकार नहीं क्योंकि मैं असहाय औरत हूँ । मेरी जगह कहाँ है उसे ही तलाशने में इस कगार पर आ खड़ी हो गई कि एक निर्भीक निर्णय ले बैठी । जाने-अनजाने अगर मेरे राजमहल में आपको और आपके बच्चों को कोई असुविधा हुई हो तो माफ़ कर देना ,उपहास की सामग्री [ मैं ] हास का ठिकाना ढुँढने पर विकल हो गई । 
    आज़ यह सोचने पर मजबूर हो गई कि क्या सोचकर मेरे माँ-बाप ने मेरा नाम निशा रखा था कि नाम के अनुरूप ही मेरी ज़िन्दगी में धुप अँधेरा है  . खुद को जलाकर घर को तो रौशन किया पर अँधेरे का एक कोना ख़ुद के लिए महफूज़ रखा । जानते हो हर रात यही सोचकर विस्तरे पर एक साथ गुजारी कि आज़ की रात के बाद शायद सुन्दर सुखद सुबह का आगाज़ होगा ,ना जाने कितनी रातें गुजर गईं उस एक रात के इंतज़ार में कि आज़ की रात तुम प्यार से पुचकारोगे अपने अंक में लेकर दुलारोगे और मैं स्नेह की गीली चादर में सिमट मैं पिछली सारी वेदनाएं भूल जाऊँगी । लेकिन जानते हो वो हसीन रात न कभी आई और ना आएगी क्योंकि जब आएगी तो मैं बहुत दूर जा चुकी हूँगी । क्या तुम मेरी गुज़री हुई प्यासी आस लौटा सकते हो, मेरी उमर का वो बीता हुआ कल मेरी झोली में जवां कर डाल सकते हो, नहीं ना । मैंने तुमसे कई बार कहा था कि मुझे तो चाहिए था एक सुन्दर हृदय जो मेरी महान भावनाओं को समझ सकता । शायद इसमें भी तुम्हारा पैसा ख़र्च होता था ।
    तुम्हें खोखली इज्ज़त बहुत प्यारी थी ,मुझे वास्तविकता बहुत न्यारी थी । मैं तुम्हारी हर परेशानी का कारण थी जो तुम्हें काट खाने वाला मौन ग्रहण करने पर मज़बूर करती थी । तिनका-तिनका जोड़कर जिस घर को मैंने तुम्हारी हैसियत और प्रतिष्ठा के लिए खुद को ज़लील कर स्वयं को स्वाहा कर निज के अथक श्रम से सजाया,संवारा,निखारा उसकी अहमियत तुम्हें कभी रास नहीं आई । ठीक उसी तरह उसका तिनका-तिनका बिखेरकर अपने तरह की ख़ुशहाल ज़िन्दगी बसर करना । बेमज़ा और बेस्वाद जीवन जीना ,जिसका नाम है सादा जीवन उच्च विचार ,किसी कन्दरा में जाकर धुनि रमाना ।
   एक बार फिर कह रही हूँ जो पल मैंने तुम्हारे साथ और तुमने मेरे साथ एक दूसरे के संसर्ग में गुजारे वो केवल तुम्हारे थे ,वो क्षणिक मिलन का आवेग केवल तुम्हारा था ,हर स्वार्थपरक छोटी सी ख़ुशी के बाद हफ़्तों,महीनों का अबोला ,फिर मान मनौवल और फिर वही घड़ी भर का तुम्हारा अपना लम्हा जिसमें खोकर मैं समर्पित । जानते हो ये सिर्फ मेरी अन्तर्व्यथा नहीं बल्कि सारी नारी जाति की व्यथा है हर पति की हार्दिक अभिलाषा होती है कि उसकी पत्नी गूँगी ,बहरी ठूँठ जैसी हो और कठपुतली बनकर उसके इर्द-गिर्द चकरघिन्नी की तरह डोलती फिरे ताकि दूसरे कहें कि अरे यार तुम तो बड़े भाग्यशाली हो । स्त्री अपना वज़ूद बेचकर पुरुषों के अधीन रहे इसी में तारीफ़ के थोड़े से अङ्क मिलेंगे शायद ।
   मैं जानती हूँ रोशन जी मेरी आहत हृदय वेदना , हृदयवेधक शब्द कुछ व्यक्त नहीं कर सकेंगे क्योंकि आप भावविहीन ,हृदयहीन हैं । इतनी शिद्दत से लिखे गए खत के हर्फ़ों को कल्पना का विलास मत समझना । ये मेरे अंतस के भूख का खुला आमन्त्रण थे जिसे तुम ढिठाई का चोला पहनकर मुझे तिल-तिल कर जलाते रहे थे । आप क्या समझते रहे मेरे पल्ले कुछ पड़ता नहीं था मैं इतनी मुर्ख थी ,नहीं ? मैं ज़हर का घूँट पीकर होठों को सिले हुए कर्व्यनिष्ठ बनी रही ताकि हमारे विवाई फटे सम्बन्धों को कोई भांप न सके । कुछ देर की घायल मनःस्थिति के अवकाश के बाद फिर उसी डाल पर आ बैठती थी जहाँ तुम्हें असीम संतुष्टि मिलती थी नए प्रहार के लिए । मैंने घर को घर बनाया था ना इसीलिए विरक्त नहीं हो पाती थी । तुम्हारे बच्चे भी तुम्हारे सुर में सुर मिलाते थे मुझमें ख़ामियां निकालने का एक सिरा तुम पकड़ते दूसरा बच्चे । क्या मैं हँसी का पात्र थी ,मेरी कर्मठशीलता में केवल खोट था जो आप लोगों को मेरे ऊपर छींटाकसी करने पर विवश करता था । तुम  हमेशा कहते थे ,बच्चे मेरी ताक़त हैं बच्चे मेरा हौसला हैं ठीक है उनके साथ अच्छा वक़्त गुजारना ।
       एक गहरी निःश्वास भरकर रोशन जी पत्र की इबारतों पर अमल करने लगे और अंत में बंद होंठों के अन्दर एक घुलनशील आह घुटकर दब गई । जीवन की सांध्यवेला में निशा तुमने यह क्या किया ,कैसा कड़ा फैसला कर लिया बिना किसी हड़कम्प के ,अहसास तक नहीं होने दिया अपने मजबूत इरादों का । एक अवसर तो देतीं मेरे अंदर के इन्सान को ढूंढने का मेरे ज़मीर को जागने का ।
   थोड़ा कष्ट करके और पढ़ लेना क्योंकि अभी बहुत कुछ शेष है कहने को । तुम हमेशा  कहते थे कोई मेरा दर्द नहीं समझता ,वास्तव में तुम्हारा दर्द था क्या। अपनी कमियों को छिपाने का खोखला खण्डहर जिसके अभेद्य किले में मेरा झाँकना तक नामंज़ूर था । तुम्हारे सोचों के अभयारण्य में मेरा प्रवेश तक वर्जित था । तुम्हारे इस व्यवहार ने हमेशा मुझे तन्हाइयों में ढकेला । उपरोक्त शिकायतों की प्रतिक्रिया जानने के लिए मैं मौज़ूद नहीं हूँगी । अगर होती भी तो वही दो टूक बात ,मेरा कोई दर्द नहीं समझता । भला मुझे तुम्हारे बढ़ाये हुए बेवजह के दर्द से क्या सरोकार । वह तो तुम्हारा ख़ुद का खड़ा किया हुआ अपनी कमियों को छिपाने का बुलन्द मीनार था । जिससे  सिर्फ घर में अशांति और एक लम्बा मौन व्रत क़ायम होता था । मुझे तो बस मेरा पति चाहिए था । तुमने अपनी ढलती उम्र का हवाला देकर बल्कि मेरे दर्द को और बढ़ा दिया था ,मेरी उमगती तरंगों को और धराशाई कर दिया था फिर से नासमझी की मुहर लगाकर । जो पत्नी सुलभ पीड़ा को और असहनीय कर गईं । मुझे तो बस तुम्हारे हृदय का एक सूक्ष्म कोना चाहिए था । जिसमें दुबककर मेरा सम्पूर्ण जीवन आत्मसात होता । तुम्हारे कहे अनुसार …तन बूढ़ा हो गया है ,अरे वो तो ख़ुद ही समय की देहरी पर शिथिल पड़ जाता । मैं मन के चंचल आवेग को कौन सी घुट्टी पिलाती कि स्थिर हो जाता । क्या तुम्हें नहीं पता कि मन कभी बूढ़ा नहीं होता ,उसे तो बस नेह की बयार, प्यार की फुहार, सराहना की थोड़ी सी ख़ुराक चाहिए होती है ,क्या उसमें भी तुम्हारा पैसा ख़र्च होता था । तुम्हारे व्यवहार की कंजूस हरियाली में तितर-वितर हो मैं भीतर ही भीतर दिन प्रतिदिन सूखती रही प्रसन्नता का अभरन ओढ़कर । मुझे तुमसे कोई शिकवा शिकायत नहीं तुम अपने दर्द की औषधि तलाशते रहना अपने विराट मौन घाटी में।
   पत्र पढ़ते-पढ़ते रोशन जी गहरी निःश्वास छोड़ते जाते और कंपकंपाते हाथों से कसकर पकड़े हुए बिना पंच किये हुए बेतरतीब पन्नों को सहेजते जाते और अगले पन्ने को पलटते ही फिर ऑंखें स्थिर हो जातीं अगली पंक्तियों पर । तुम्हारी गहरी निर्दई नींद को कभी मेरी करवटें जगा नहीं सकीं , मेरी बंधी हुई आस ,उम्मीद को कोई भी रात तुम्हारे आग़ोश की गर्मी नहीं दे सकीं क्योंकि इसमें भी तुम्हारा पैसा ख़र्च होता था । मैं वही निशा हूँ जिसके शीतल अँधेरे ने तुम्हें लोरी सी थपकी देकर गहरी नींद का सुख दिया और निशा को निशा की भींगती रात का गहन सन्नाटा ।
     और क्या लिखूँ ,तुम मेरे मौन निमन्त्रण की अभिव्यंजना तक नहीं बाँच पाये । तुम्हारे ज्ञान का कोष इतना कमज़ोर क्यों था ,तुम्हारे परख़ की क्षमता इतनी मटमैली क्यों थी ,विवेचना करना आराम से , मैं जा रही हूँ अपने ख़्वाबों का महल बनाने अपने क़लम की  कृति बनने । तुम मेरे मन के परिन्दों को ऐसी चादर और चहारदीवारी में क़ैद कर रखना चाहते थे जहाँ मैं फड़फड़ा भी नहीं सकती थी । अन्य बेढब ,कुन्द और ठूंठ औरतों जैसी बनने की तुम्हारी हिदायतों से मैं और विचलित होती । मेरे कलाओं की हवेली को संवारने ,निखारने सराहने और प्रोत्साहित करने में भी तुम्हारे पास शब्दों के अभाव थे। जिसे ख़र्च करने में तुम ग़रीब हो जाते । तुम हमेशा मुझे ताने देते की मैं अपने को बहुत क़ाबिल समझती हूँ ,क्या वह प्राकृतिक सम्पदा तुम्हें मुझमें कभी नहीं दिखीं । यदि मुझमें कुछ अलग था तो वो पिता जी की विरासत का अनूठा उपहार था मैं अपने पिता जी के सोच की कायल थी पर,पति के अति असंवेदनशील सोच से घायल भी होती थी । क्या कभी इसका अन्दाज़ा लगा तुम्हें । तुम्हारे सोचों के घटियापन ने मुझे बहुत बार तोड़ा । जो तुम दूरियाँ कायम करते थे ना मुझे पराजित करने के लिए उसे मैं बख़ूबी महसूस करती थी । तुम इतने भी नादान और नासमझ नहीं थे कि मेरी अभिरुचियों और अभिव्यक्तियों की भूख को नहीं समझ पाते थे।
     रोशन जी आप द्वारा दिए गए ठेसों का कुनबा इस ख़त में अंकित कर आपके पास छोड़कर जा रही हूँ सुकून और चैन हासिल करने के लिए । एक वह वक़्त था जब मैं तुम्हारी किसी भी बात पर आहत हो आँसू का दरिया बहाया करती थी और तुम उसे अपने स्वार्थ की रुमाल से सोख लेते थे और मैं अबोध बालिका सी सूखे पत्ते की तरह हवा के साथ बह जाया करती थी ,पर अब मैं नहीं रोती क्योंकि तुम्हारे बंजर सीने में अब रेती के फूल नहीं खिलते । इस शज़र की शाख़ को तुमने यह कहकर धराशाई कर दिया कि मेरी भी अब  ……।
    जब भी समापन की ओर बढ़ती हूँ अनकहे भी मुखर हो उठते हैं अपनी कहने को । जानते हो मैंने कब-कब अपने उफ़नते हुए ज्वार-भाटा को रोका ,कब-कब संयमित किया खुद को । कभी तुमने समझने की कोशिश की ? नहीं ना । मैंने कभी हया की परिधि को लांघा नहीं अर्धांगिनी होते हुए भी ,क्योंकि स्वाभिमान ने कभी स्तर घटाने नहीं दिया । तुम मर्द थे झटकार देते तो । समुद्र की सतह तो शान्त हो जाती पर तह की हलचल मुझे धिक्कारती , इसीलिए मैंने कभी  .......|
    मैं अपने साथ तुम्हारा कुछ भी नहीं ले जा रही , बेआवाज़ प्रहार की प्रतियाँ मज़मून के रूप में तुम्हारे हाथों में होंगीं । पढ़ते-पढ़ते आदत के अनुसार इसे भी दुत्कार मत देना । प्यासी नदी अथाह जल के तलाश में अज्ञात दिशा की ओर जा रही है ,बहती धार अपना रास्ता निकाल लेगी । तुम्हारी अनपढ़ ,गंवार ,कुन्द ,गूंगी जुबान वाली निशा बन नहीं पाई ,माफ़ करना ।अपनी अभिरुचियों से मज़बूर निशा ।
                                           मन की गिरह खोलकर रख दिया है तेरे आगे
                                           अनजान डगर पर निकल पड़ी ना जाने कहाँ ,
                                           कब,कैसे मिलेंगे व्यथित हृदय के रेशमी धागे ।