Friday, 6 September 2013

भौतिकता की आँधी

                                   'भौतिकता की आँधी' 


हँसी अनमोल तोहफ़ा कुदरत का 
हँसना हर शख्श हँसाना भूल गया है 
मौजूदा दौर ले जा रहा रसातल                       
मशरूफ जिंदगी में हर कोई  
कहकहा लगाना भूल गया है। 

रफ्तार ज़िन्दगी की तेज हो गई 
दिल्लगी लब्ज ही भूल गए सब 
जिंदादिल लोग नहीं मिलते अब 
प्रेम की ऊष्मा उजास में भी 
अजीब सा बासीपन आ गया है। 

हाथ -हाथ की शान बनी अब 
हर हाथ में खेल रही मोबाईल 
कर से कलम जुदा कर दी है 
हर कान के पट इठला कर 
ठाठ से झूल रही स्टाईल।  

ख़त के सुन्दर भाव हजम कर 
हर हर्फ निगल करती स्माईल 
शह मात का खेल , खेल रही 
कंप्यूटर की फटाफट अब तो 
धड़ाधड़ देखिये फाईल फर्टाईल। 

भौतिकता की चकाचौंध में क्या 
जीवन का फ़लसफा मालूम नहीं 
दुरुस्त सेहत ,कामयाब राह की 
मुकम्मल हमराज,ठहाका क्यों
आज हर तबका ही भूल गया है।  

इक्कसवीं सदी में लुप्त हो रही 
थातियाँ पुश्तैनी क्रिया कलापों की 
धुंधला हो रहा दर्पण समाज का 
तमाम नई-नई व्याधियों के 
आक्रमण से हर कोई जूझ रहा है। 

बिखरते संस्कार ,टूटते परिवार 
बिलुप्त मान्यता ,धर्मविहीन निति 
खुद में ही कैद कर जीवन इन्सान 
मनोरंजक साधनों के वशीभूत हो   
असल जिंदगी से ही बहक गया है। 
                        
                                         शैल सिंह