Tuesday, 7 August 2018

कब आओगे खत लिखना

" कब आओगे खत लिखना "

निसदिन राह तकें सखी 
दो प्रेमपूरित नैन 
उन्हें कहाँ सुध थाह कैसे 
कटती विरह की रैन,

पाती प्रिय को लिखने बैठी
व्यथा उमड़कर लगी बरसने
पीर हृदय की असह्य हो गई
कलम क्लान्त हो लगी लरजने
अभिव्यंजना व्यक्त करूं कैसे ,

चांदनी छिटकी गह-गह आंगन
यादें मुखर हो कर गईं विह्वल
अन्तर्मन फिर से संदल हो गया
भ्रान्तचित्त हो गए हैं प्रियवर 
भाव-भंगिमा व्यक्त करूं कैसे ,

अश्रु की जलधारा में  प्रिय
प्रीत की स्याही घोलकर
उर का अंतर्द्वंद लिख रही
पढ़ना मन की आंखें खोलकर 
रससिक्त भाव व्यक्त करूं कैसे ,

आँखों में अंजन बनकर
दिन-रात समाये रहते हो 
अन्तर में कर वसन्त सी गुदगुदी 
उर पात्र में कौमुदी खिलाये रहते हो
बिन तुम स्वप्न अभि‌सिक्त करूं कैसे ,

सूख वेणी केश की झरी सेज
अमृत-कलश वृथा अधर के
कैसे समझाऊँ प्रीत की रीत तुम्हें
लिख चार पाँति में पीर हृदय के
और जो अतिरिक्त व्यक्त करूँ कैसे

कितनी और करूँ मनुहार काग की
कब आओगे खत लिखना
पगली पुरवा पवन बहे चंचल
कैसे रोकूं मन का अत्यंत बहकना 
शेष अवशिष्ट व्यक्त करूँ कैसे ,

तूलिका ने रंग समेटा
मन का चित्रण अभी अधूरा
शब्द हठीले हो गए प्रियवर
रचूं किसके सह वक्ष की पीड़ा
अनकही हृदय की व्यक्त करूं कैसे ।


भ्रान्तचित्त---बेखबर
अवशिष्ट--बाकी बचा हुआ
सर्वाधिकार सुरक्षित
           शैल सिंह