Thursday, 28 June 2018

kavita '' एक सैनिक की चिट्ठी माँ के नाम ''

एक सैनिक की चिट्ठी माँ के नाम 

खत के मजमून क्या हैं
पढ़ने की स्थिति में होते नहीं
धैर्य का पुलिन तोड़ बहा मत करो
इस तरह खत माँ लिखा मत करो,

टपकी हुई बूंदें,छितरी हुई स्याही
बिखरे हुए अस्पष्ट शब्द,
कातरता से भींगे सिमसिम से पन्ने
माँ एक भी हर्फ पढ़ ना सकूं
इस तरह विक्षिप्त हो जाता हूं माँ 
वात्सल्य से सींचा,भावनाओं से भींगा
अहसासों में पिरोया,जज्बातों से गीला
अबसे सादा कागज लिफाफे में भर भेजना
तेरीे हर अभिव्यक्तियां महसूस कर लूंगा माँ ।

तेरी नसीहतों का पालन करता हुआ
मुस्तैदी से ड्यूटी निभाता हूँ माँ
रूखा सूखा निगल लेता हूँ कुछ भी
तेरे स्नेहिल हाथों का निवाला महसूस कर माँ
मुंह पोंछ लेता हूं आभास कर तेरे आंचल का छोर
सीवान में ,बियाबान जंगल में भी
खुले आसमान तले सर्दी-गर्मी में भी
कहीं भी सो लेता हूं,नरम गलीचा समझ
तेरे हाथों की थपकी का अहसास कर माँ ।

इस तरह आद्र होकर हाल मत पूछा करो
खत का स्वरूप देख आंदोलित हो जाता हूँ मांँ
गडमड हो जाते हैं आंसूओं के तालाब में
आड़ी-तिरछी लगें तहरीर की हर पंक्तियां
बयां करते हैं खत तेरा हाल जो
बिखर जाऊंगा माँ हौसला मुझको दो
देश की रक्षा लिए है दुश्मनों का संहार करना
लम्बी उमर की रब से दुआ बस करो
इस तरह खत माँ लिखा मत करो।

तेरे दूध का ऋण आया अदा करने माँ 
उस अनमोल दूध की दुहाई ना देना
कहीं विचलित ना हो जाऊं इस महान कर्म पथ से
देश पर मंडरा रहे घातों के बादल घेनेरे
चौकसी में तैनात दिन-रात सीमाओं पर
प्राण रखकर हथेली पर हम लाल तेरे
शत्रुओं का विनाश करने की मन में है ठानी
ऐसी रवानी पे माँ फख्र किया बस करो
इस तरह ख़त माँ लिखा मत करो।

                                       शैल सिंह