Sunday, 8 April 2018

ग़ज़ल। " कैसे मच गई गदर हवाओं में "


      गजल

" कैसे मच गई गदर हवाओं में "

बिस्तर की सलवटों से पूछिए
गुजारी है रात किस तरह
शब-ए-हिज्राँ क्यूँ टपके शबनम
नम तकिये हुए हैं इस तरह

इक बार देख जाईए
दिलक़श तन्हाईयों का मंज़र 
बेआबरू सा कर दिये हैं
उमड़ के यादों का समंदर
बहलाने छत पे जाऊं कैसे
ले ख्वाबों का बवंडर
कर देगी दिल को और छलनी
चाँदनी की गहनाईयों का खंजर ।

सब्र बेकरार अब्र आँखें 
तमन्ना दीदार की है
अक्स उभरते हैं खयालों में 
परवा न संसार की है
सहना जुदाई आसां मगर
सहना बेरूखी न प्यार की है
कशमकश में ढल न जाए उम्र यूँ
छोड़िए नाराजगी बेकार की है ।

खाई कसम वफ़ा की क्यूँ
हाथ थाम हर जनम के लिए
दिल में बो के बीज प्रीत का 
कयूँ छोड़ा दहर में गम के लिए 
पट घूंघट का खोला जो कली ने
क्यूँ मिले नयन दो इक वदन के लिए
कैसे मच गई गदर हवाओं में 
महकी खुश्बू जो थी चमन के लिए ।

                         शैल सिंह