Friday, 26 January 2018

" इक दीवाना "

दीवाना किया आशिक़ी ने
बेइंतहा प्यार में
तप रही है देह सारी
इश्क़ के बुखार में ,

बस में नहीं दिल जरा भी
होश नहीं खुमार में
निग़ाहें साधे रहें टकटकी
किसी के इंतजार में ,

ख़्वाब बुनते बीतते दिन
दिल लगे न कारोबार में
आँखें इक झलक भी चार हों
खिल जाते दीदार के बहार में ,

वफ़ा भी करे गर बेवफ़ाई
आनन्द आए तकरार में
मनाना,रूठना शिकवे,गीले
रोज मनुहार करते प्यार में ,

भय बदनाम होने का भी
ज़िक्र कर देता लब बेक़रार में
गढ़ते तारीफ़ के क़लमें सदा
इशारों से बेनाम के बाज़ार में ,

इश्क़ में मौजे,तूफां है लेकिन
इश्क़ इक सजा है पठार में
दिल नादान जानता ही नहीं
काँच ही काँच प्यार के दयार में ,

फासला नहीं फूलों,काँटों में
अड़चनें मोहब्बतों के ज्वार में
मुरादें पूरी हो मर्ज़ी ख़ुदा की
बेतहाशा गम भी है इकरार में।

                          शैल सिंह