Tuesday, 22 December 2015

नारी मर्म न जाना पुरुष जगत तुम ताक़ीद किया नारी धर्म निभाने की ,

नारी मर्म न जाना पुरुष जगत तुम
ताक़ीद किया नारी धर्म निभाने की ,    

कब झांक के अन्तर्मन देखा तुमने
जिसकी कितनी सागर सी गहराई                      
झाग सी उठती लहरें देखीं,ना देखी
शान्त,स्निग्ध सलिला क्यों बौराई ,

बोलो कब ज़िद की थी मैंने तुमसे
देदो ना लाकर मुकुट हिमालय का
बोलो कब चाहा देवी की मूरत बन
मूक शोभा बनकर रहूँ देवालय का ,

मुझे बांध कर तुमने वर्जनाओं में
लक्ष्मण रेखाएं खींच रखी कितनी
तुमने जकड़ परिधि के जंज़ीरों में
मेरी तय कर दी सीमाएं हैं कितनी ,

क्या मर्यादायें क्या संयम की तुम
हरदम मुझे बतलाते रहे परिभाषा
छल करते आये ओढ़ कर आवरण
नहीं जानी मन की क्या अभिलाषा ,

मैंने द्विज के वचन निभाए सातों
सच्चे बन्धन में खुद को रखे बाँधा
फिर भी अग्नि परीक्षा लेकर क्यों
सतीत्व का तुमने प्रमाण था माँगा ,

मैं तो सम्पूर्ण समर्पित वामांगी बन
जीवन सेवा के यज्ञकुंड में स्वाहा की
तुम अग्निसाक्षी नियम ताक़ पे रखे
मैं तन जला दीया सी देहरी आभा की ,

खुद लगा मुखौटा मुख हजारों रंग के
उड़ाई मेरे अटल विश्वास की धज्जी
व्यर्थ ही पूजती रही तुझे देवतुल्य मैं
अस्तित्व बना दिया कागद की रद्दी ,

लूटा दी ममता,स्नेह की चिर तिजोरी
लूटा दिया वात्सल्य का सारा संसार
बहाकर प्रेम की अतल,अथाह नदी मैं
ढूंढ़ती फिर रही हूँ पूरे जीवन का सार ,

                                  शैल सिंह