Thursday, 20 August 2015

'' तुम हाँ तुम ''

               '' तुम हाँ तुम ''

कितनी बार उमड़ कर बरसी ,बदली बन मेरी घनीभूत पीड़ा
काश कभी तुम पोंछ दिए होते स्नेह में बोर-बोर इन पोरों से ,

जो अभिव्यक्ति भर गीतों,छंदों में अलापी थी मेरी मन वीणा
काश कभी तुम सुन होते विक्षिप्त दर्द भरे आरोह-अवरोहों से ,

उर के अतल समंदर न जाने कितने थे बेशकीमती रत्न छिपे
काश कभी तुम खोज लिए होते पैठ अंतर्मन के गोताखोरों से ,

कलमवद्ध कर कविता में उर के अनमोल मोती थे पिरो दिए
काश कभी तुम पढ़ मन से दूर किये होते दर्द के उन कुहोरों से ,

उर्वशी,रम्भा सी कहाँ देह मेरी तुझे मत्स्यगंधा सी नशा मिली
काश क़ि योगी के तप भंग करने के मुझमें होते ढंग छिछोरों से ।

                                                               शैल सिंह