Thursday, 25 September 2014

                                                                             ''माँ अम्बे''

 
शिलाएं तो बेजान ये शिल्पी की रचना
क्यूँ भटकती रही आज तक द्वारे-द्वारे
माँ के दर्शन को प्यासी ये दोनों आखें
जगदम्बे बसी जब कि उर में हमारे ,

मन में विश्वास का एक मन्दिर बनाकर
कल्पनाओं में साकार प्रतिमा सजाकर
सच्ची लगन का दीया,धूप,चन्दन,अगर
अखण्ड श्रद्धा की रोली,अक्षत चढ़ाकर ,

विश्व संताप के शमन को हवन हैं किए
सुख शांति औ समृद्धि अमन के लिए
आरती भी उतारी पूजन,अर्चन किया
शीश चरण में झुकाया नमन के लिए ,

जग की तरिणी डांवाडोल अब हो रही
देवभूमि से संस्कृति विलुप्त हो रही
हम सबकी आधार माँ बस तू-ही-तू
टूटी कश्ती की पतवार इक तू-ही-तू ,

दोनों कर जोड़ती अर्चना सुन ले माँ
स्याह फैला अँधेरा धरा पर मिटा दे
मन से मन के सभी टूटे तार जोड़कर
प्रेम की घर में पावन सी गंगा बहा दे ,

मन के दुर्भाव कर भष्म नैन ज्वाला से
जग में सद्भाव भर दे अभय हस्त से
हम सन्मार्ग पर ही सदा चलते जाएं
कभी जिसपे न आँधी औ तूफान आए ,

भाव भक्ति का भर सदाचारी बना
स्वार्थ सारे मिटा परोपकारी बना
शिष्य तेरे सभी सत्यपथ पर चलें
लाली नवयुग की बन दमकें;खिलें ,

विश्व की वेदना का हम चिन्तन करें
और विकल हो उठें जग के भय पीर से
दिव्य अहसास का बोध जन-मन को हो
निर्मल हिय से सदा बांट लें दर्द को ,

ज्ञान के यज्ञ में स्वाहा कल्मष करें
साथ सब मिल हँसें भाव ऐसा भरें
ऐसी दुनिया बना दे जो लागे भली
नेह की बाती जलती रहे हर गली ।
                                 शैल सिंह