Tuesday, 2 September 2014

''दिल्ली और मुंबई के रेप कांड पर मेरी ये कविता''

दुष्कर्म जैसे वारदात और नाबालिगों को शह देती व्यवस्था पर

ऐसे अपराधियों की सजा पर बिना मतलब बार-बार बहस क्यों छिड़ती है।कम उम्र का बच्चा अपना पौरुष बल दिखलाकर एक किशोरी का ,अपने से बड़ी उम्र की महिला का अस्मत तार-तार करने में सक्षम होता है ,
उस समय तो अपनी उम्र से बड़ा हो जाता है फिर इतने जघन्य अपराध के लिए सजा के वक्त नाबालिग क्यों करार दिया जाता है और सभी लोग मनोवैज्ञानिक क्यों बन जाते हैं ,इसी लिए बार-बार ऐसी घटनाएँ दुहराई जाती हैं ,इसका निदान तभी सम्भव है जब बालिग ,नाबालिग का मोहरा ना इस्तेमाल कर अपराध के बदले कड़ी से कड़ी सजा सुनिश्चित की जाये। 

                  ''दिल्ली और मुंबई के रेप कांड पर मेरी ये कविता'' 

कलुषित हो रही संस्कृति मानवता का ह्रास होता
सुरभित उपवन है आज समरसता का सार खोता
चमन से मद में सौरभ नीले अम्बर बहक गया है
कली-कली हर सुमन जंगल-जंगल दहक गया है।

विद्रूप हो रहा है समाज का मन फटिक सा दर्पण
हृदय पात्र क्यों है रीता कर अधर किसलय अर्पण
जहाँ कलरव स्वछन्द विचरते कोलाहल चीत्कारें
जीवन की जहाँ प्रत्यूषायें बरसतीं हलाहल अंगारें।

मस्तिष्क की शिराओं में वासना का वास भरता
मन के मचानों पर उन्मत्त राक्षस निवास करता
क्यों सोच का फलक इतना शापग्रस्त हो गया है
व्यभिचार की मण्डियों में ओछा सहवास करता।

संदल सुवास सा गमकता अमर मधुर वो बंधन
हर कोण को कलंकित करता सदी का परिवर्तन
रिश्तों की क्या परिधियाँ आज हो रहा उल्लंघन
कपटी विकृतियों का दंगल कर रहा अभिनन्दन।

आशनाईयाँ कैसी माँ-बहन-बेटियों की आबरू से
शुचिता कंचनी सिसकती हैवानियत की रूबरू से
सांद्रतायें दुर्भिक्ष हो रही नदी में दुर्भावना के बहके
मन कछार तट तोड़ के आत्मावलोकना की बहते।

नाबालिगों को शह देती लचर कानून की व्यवस्था
क्यों कुकृत्य करते वक्त आड़े आती नहीं अवस्था
जघन्य अपराध की मिले कड़ी सज़ा अपराधियों को
बहसों के खलिहान मत भटकाईये असल मुद्दों को।

अभद्रता की सीमाएं लांघते नाबालिग सयाने बनके
अस्मिता को रौंदते जब सोलहवें साल के घड़े भरके
नाबालिग करार देकर सजा का प्रावधान गर घटेगा
ऐसी दरिंदगी का हिसाब समाज खुद से ही कर लेगा।

                                                                   शैल सिंह