Thursday, 14 August 2014

भीषण अपराधों के मालिक तुम


भीषण अपराधों के मालिक तुम



हे गर्वित निष्ठुर भगवान सुनो
क्यों बैठ के लीला देख रहे तुम
आँखें मूँद हिमालय चोटी पर
पत्थर दिल द्रवित नहीं होता रे
क्यों समाज के करुण शोर पर ,

साधना अवहेला कर दी घायल
सृष्टि रचने वाले ईश कहाँ तुम
कैसे भाव अभाव से भरे हृदय में
जहाँ इंसा इंसा का मोल न जाने
मर्यादाएँ लहूलुहान दाग़ दामन में ,

अर्चना दुहाई कब मन भाई निर्दय
क्यों पाप-पुण्य की खिंची रेखाएं
सब तेरी ही मर्जी का खेल तमाशा
जग जीवन त्रस्त,अस्त-व्यस्त,क्या 
पाषाणी जाने तूं क्लान्त की भाषा ,

भीषण अपराधों के मालिक तुम
तुम्हीं संतापों के निपुण रचयिता
क्या कभी ग़ौर से देखा भी तुमने
हादसों ,हत्याओं के कालसर्प को
चीरहरण की चीखें वीभत्स दर्द को ,

कूटनीतिक व्यूह सब तेरी चाल का
सांसों की आजाद तरंगे भय से बंदी
चाँद-सूरज पे भी आतंकों का साया
जीवन गिरवी भी तेरे हाथों भिखारी
हिंसा के दावानल में भी तेरी माया ,

भेदभाव कर नर-नारी के अवयव
देख शर्मनाक दृश्य स्व करनी का
तेरे बंदे ही डाका डाल रहे लाज पर
रूह कँपाते हाथ तेरे आपदा त्रासदी
काश होता हवालात दोष निर्माण पर ।


                                  'शैल सिंह