Tuesday, 3 December 2013

सम्भल जाओ सत्तासीनों

राजनीति का स्तर गिर रहा निरन्तर 
मूल्य और मर्यादायें हो रही हैं छलनी
चारित्रिक पतन नैतिकता से दुश्मनी
ईमान बेच खाते ज़मीर बेच खाते
मौका परस्त नेता जुबान बेच खाते
तुच्छ स्वार्थ पूर्ति हेतु खुद को गिरा दिया है
राष्ट्र और समाज को नीचा दिखा दिया है
मनुष्यता है मर गई आदर्श मिटा दिया है
समस्या गम्भीर क्या है मुद्दे ज्वलंत क्या हैं
मंहगाई की मार में गरीबी का उपचार क्या है
हमारे मत का ले ख़जाना हमें पतली गली दिखाते
अब हमने भी ठान ली है कैसे मजा हैं चखाते
बदलाव के इस दौर में ज़ुबानी वार कारगर नहीं
सम्भल जाओ सत्तासीनों किसी बात का असर नहीं
नमो-नमो के नाम से क्यों नींद उड़ गई है
आरोपों के फेहरिस्त से जनता और भी चिढ़ गई है ।
                                                       शैल सिंह