Sunday, 10 November 2013

भगवन तुमने ही तो कहा था

स्वरचित ....... 

मेरे  मन  वीणा   का  तार   छेड़कर 
निज व्यथा के गीत सुनाना मुझको
मेरे  मन  मंदिर  का  द्वार  खोलकर
बन  साधक  सदा  रिझाना  मुझको ।

कित  बार  नवाया  शीश  चरण तेरे
गिरिजाघरों  , गुरुद्वारों  की   ड्योढ़ी
मन मुराद की  खातिर भटक-भटक
कितने मंदिरों ,मस्जिदों  की  सीढ़ी ।

दुःख  ही  दुःख  तम्   पीड़ा   आँगन
मधुर-मधुर  कब गूँजेगी किलकारी
सीना  चीर  अधर  पट  खोलूँ  अगर
तह  की  हिलक   उठेगी  सिसकारी ।

गहरी   आस्था   विश्वास  कवच  पर
जिंदगी   न्योछावर  किया  तुझ  पर
कोई  खोट  हुई   या  चूक  हुई मुझसे
कि   पूजा  रही  अधूरी  रूठा  मुझपर ।

दर  आँचल   फैला   बस  माँगा  साईं
सौगात  में  बिटिया  लिए  ख़ुशहाली
बढ़ें  प्रगति  पथ  स्वामी  मेरे ,बेटे के
सपनों  का  सतरंगी   'पर'  हो  आली ।

क्यों  तिर  इतराते पलकों पर आकर
सपने  सज  संवर  क्यों  खुद ही गाते
क्यों  सुख सागर  की लहरों  पर गोते,
नगमों में सज कर पुनः  बिखर जाते ।

ना  तो  कभी  ईमान  का  दामन छोड़ा
ना  ही  कभी  कर्त्तव्यों  से  थी कतराई
क्यों  क़तर  उड़ानों  का  'पर'  रब तूने
किया  हसीं  सपनों  का  रंग  धराशाई ।

क्या मिला ईमान के पथ चल मुझको
कब मिली श्रम की ही अकूत मजदूरी
कहाँ लघु सपना ही मेरा  साकार हुआ
क्या  हृदय धन की  तेरे ऐसी मजबूरी ।

क्यों स्वप्न लोक भंवर में उलझाकर
कभी कश्ती को दिया सही किनारा ही
क्यों बनवाया भरभराता नीड़ रेतों पर
लिलवा लहरों से दिया नहीं सहारा ही ।

ना तो कभी ठिकाना सूरज पर माँगा
ना कभी दिन में की तारों की ख्वाहिश
चाहत के खुर बस टेसू सा रंग भर देना
बस इतनी ही तो की थी तुझसे गुज़ारिश ।

अरदास ख़ुदा की किया अजान मस्जिद में
मन्दिर में तरन्नुम रत रही राम भजन में
चला गया जीवन ही थाल सजा भरमाने में
हाय पत्थर के देवता तुझे मनाने रिझाने में ।

                                                  शैल सिंह