Tuesday, 23 July 2013

        ''उस हिस्से की एक कड़ी मैं भी''


घर के सभी लोग गमगीन माहौल में छत पर धूप में बैठे थे सर्दियों का दिन था .दरवाजे की घंटी बजी तो भतीजे मनु से दीदी ने कहा जा देख कौन आया है . मनु दरवाजा खोलकर जब ऊपर आया ,साथ में आने वाला मेहमान भी ऊपर आ गया। देखा सामने विवेक भैया खड़े हैं .अम्मा के मरने की खबर सुनकर विवेक भैया मेरे घर आये थे। उस वक्त मैं भी वहां मौजूद थी। वह अकेले नहीं आये थे साथ में उनका बेटा भी था,मुझे देखकर उन्होंने बेटे से कहा था बेटा बुआ का पैर छूकर आशीर्वाद ले ये तेरी बुआ हैं। मैं विवेक भैया को बहुत लम्बे अंतराल के बाद देखी थी,वैसे मिले तो वो थे अपनी चिर परिचित अंदाज में ही पर मुझे ही कहीं से एक कोना खाली-खाली सा प्रतीत हुआ था, जिसमें अतीत की ना जाने कितनी झलकियाँ थीं। आज उन्हें इस रूप में देखकर मेरा पन्द्रह साल पीछे जाना लाजिमीं ही था।
    इन पंद्रह सालों में क्या हुआ मुझे नहीं मालूम,जब इतने बड़े बेटे के साथ उन्हें देखी तो यही अंदाज लगायी की जरुर इनका व्याह उसी दरम्यान हुआ होगा जब मैं अपने व्याह के चार साल बाद यह जगह छोड़ी थी। उड़ती-उड़ती खबरें कुछ जरुर सुनी थीं। विवेक भैया के व्याह के समय मैं उस शहर में नहीं थी इसीलिए क्या-क्या प्रतिक्रयायें हुईं अनभिज्ञ रही। उनके उस प्यार का क्या हश्र हुआ जिसके कारण चर्चा का विषय हुआ करते थे। यह सब जानने की इच्छा बलवती जरुर हुई,पर कुरेदना ठीक नहीं लगा,वैसे भी अपने अतीत को याद कर वर्तमान को कोई दुखी नहीं करना चाहता,चाहे वह रात की तन्हाईयों में जिंदगी भर अपने प्यार के लिए भटकता रहे । जिस अतीत का अस्तित्व तक मिटा दिया गया हो,अब उसकी क्या अहमियत, पर भैया को देखकर तरस बहुत आया था,क्योंकि उनके अटूट प्रेम प्रसंग के अन्तरंग पहलुओं से मैं भलीभांति वाकिफ थी। कहीं से लगता ही नहीं था कि ये दोनों कभी एक दुसरे से जुदा भी होंगें। जरुर कोई विस्फोटक वाकया हुआ होगा वरना यह असंभव था दोनों को एक बंधन से अलग करना। मैं क्या साथ का हर कोई जानता था कि वे दोनों एक जान दो शरीर थे। निम्मों की शादी के समय भैया के सीने पर कितना गहरा वज्रपात हुआ होगा,अनुमान लगाना कठिन है। कैसे सहा होगा घर के सामने से ही दुल्हे का घोड़ी पर चढ़ कर आना और निम्मो की विदाई की वह घड़ी .पर उस महरूम घड़ी को भी तो देखना उनके नसीब ने छीन लिया था , यह नहीं देखने के लिए ही तो उन्हें वहां से हटा दिया गया था दूसरे शहर .
    हाँ एक बार छुट्टियों में जब घर आई थी तो उनके घर अवश्य गयी थी आंटी अंकल  से मिलने। उस समय भैया घर पर नहीं थे,थे तो उनके छोटे-छोटे दो बेटे और आंटी अंकल,साथ में घर की उदासी। पहले सी वो वाली रौनक नहीं दिखी ,जिस रौनक के वशीभूत हम सभी उनके घर खींचे चले जाया करते थे। शायद मन को मारकर यह रिश्ता कायम किया गया था जिसको निबाहना अब जीवन की जरुरत बन गयी थी। जब हम सब सहेलियाँ विद्यार्थी जीवन में विवेक भैया के घर जाया करती थीं कितना आनंद आता था,जब भैया घर में होते थे उनके चटपटे कारनामों के बीच कब समय फुर्र हो जाता था शायद घड़ी की सूई ही घर जाने की याद दिलाती थी। आंटी ने ही बताया था ये दोनों विवेक के बच्चे हैं अंकल उन दोनों को पढ़ा रहे थे,भाव शून्य। विवेक भैया की प्रसन्नचित वाली गतिविधियाँ ना के बराबर थीं,इसीलिए वहाँ  के माहौल में पहले सी गर्मजोशी नहीं दिखी। बच्चों को देखकर कहीं से नहीं लगा की ये विवेक भैया के अपने बच्चे हैं कारण शक्ल सूरत काफी हद तक अपनी माँ पर गए थे। जब मैं उनके घर गयी थी भाभी अपने मायके बनारस गयी हुई थीं,देखा तो बस शादी का एलबम,जिसमें भाभी की तस्वीर देखकर अनायास ही तुलनाओं के कगार पर खड़ी हो गयी। कहाँ विवेक भैया कहाँ उनकी बेमेल जोड़ी। भैया जितने ही लम्बे,आकर्षक व्यक्तित्व वाले भाभी उतनी ही ठिगनी,बे डील डौल साधारण नैन नक्श वाली।घर के वातावरण को देखकर साफ जाहिर हो रहा था कि यह स्थिति समय के मारे हुए आघात का एक कोना है। खैर ......
   जिंदगी की गाड़ी किसी ना किसी रूप में तो खींचनी ही होती है सो ख़ुशी से ना सही मजबूरी में ही विवेक भैया का विवाह बन्धन में बंधना समय की मांग थी। आखिर कहाँ तक घिसटते हुए अतीत के सहारे जिंदगी का लम्बा सफर तय किया जा सकता है। मैं तो उनके बीते हुए खुशहाल और चहकते हुए लम्हों की गवाह थी .भैया को निम्मों से बेहद प्यार था .निम्मों उनकी बड़ी भाभी की छोटी बहन थी।निम्मो बहुत ही रईस खानदान से ताल्लुक रखती थी .बड़ी बहन की शादी बड़े भैया से उनका खर खानदान देखकर नहीं हुआ था बल्कि बड़े भाई की योग्यता पर हुआ था वह अमेरिका में किसी ऊँचे पद पर कार्यरत थे .विवेक भैया पढ़ाई में फिसड्डी थे सुबह शाम तफरी करना ,मौज मस्ती करना यही उनकी दिनचर्या थी .बड़ी भाभी उनकी कारगुजारियों से नाखुश रहती थीं .एक बार बड़ी भाभी के घर कोई फंक्शन था वह अमेरिका से आईं हुईं थीं ,उसी समय विवेक भैया का हाई स्कूल का परीक्षा परिणाम आया था ,वह भी थर्ड डिविजन से पास हुए थे,एक ही क्लास में तीन साल फेल होने के बाद ऐसा नतीजा आया था।ख़ुशी ख़ुशी दौड़कर अपनी भाभी के घर खुश खबरी सुनाने गए ,दोनों के घर आसपास ही थे .भाभी तो वैसे ही खार खाई हुई रहतीं थीं ,सो उन्होंने बधाई के दो शब्द ना बोल कर भरे मेहमानों के बीच उनकी बहुत ही खिंचाई और बेइज्जती कर दी थी .
    छाती पर साँप लोटने जैसा दंश उन्होंने महसूस किया था उस समय विवेक भैया ने निम्मो से प्यार का नाटक बड़ी भाभी द्वारा बेइज्जती का बदला लेने के मकसद से किया था .तब निम्मो आठवीं की छात्रा थी .उनकी आकर्षक सुगठित देह ईश्वर की देन थी उस पर से फैशन की पराकाष्ठा ,ऊपरी व्यक्तित्व खुद का बनाया हुआ ,कोई भी आकर्षण में बंध जाये .अपनी इसी पर्सनैलिटी को उन्होंने भुनाया था अपने अहं की तुष्टिकरण के लिए उन्होंने निम्मो के भोलेपन का फायदा उठाया था .उन्होंने ठान लिया था कि इनकी बहन को बर्बाद करके ही छोडूंगा ,पर हुआ उल्टा ,इस बदले की भावना में दिन पर दिन दुनिया से बेखबर प्यार इतना परवान चढ़ा कि दोनों का एक दूसरे के बिना रहना नामुमकिन सा हो गया .प्यार के इस गुपचुप खेल ने इतनी ऊँची पेंग बढ़ाईं कि पीछे लौटना बहुत बड़ी नाइंसाफी लगने लगी कारण रिश्ते की मर्यादाएं टूट चुकी थीं .निम्मो के घर वालों को तो इसकी भनक तक नहीं थी .रिश्तेदारी होने के नाते शक की कोई गुंजाईश जो नहीं थी .घर का पासपास होना अपने आप में सुविधा मुहैया कराती .छिप छिपाकर मिलने में कोई अड़चन नहीं आती थी .विवेक भैया ने अपना कमरा भी ऐसा चुना था कि कभी कोई उन दोनों को रंगे हाथ नहीं पकड़ सकता था  .घर के मूख्य द्वार वाला कमरा उन्होंने अपना बना लिया था .रात के अँधेरे में निम्मो चुपके से घर के सभी सदस्यों के सो जाने के बाद आ जाती और मुँह अँधेरे चली जाती .ना जाने कितनी ही रातें उन दोनों ने एक दूसरे की सहमति से एक साथ गुजारीं थीं . मीठी-मीठी  प्यारी-प्यारी बातों को विवेक भैया ने रिकार्ड भी किया था ताकि हम सब विश्वास कर सकें ,उन्होंने टेप रिकार्ड ऑन कर अपने अन्तरंग प्रीत से सराबोर पलों के खुश्बू से हम सबको परिचित भी कराया था .यह दर्द उन्होंने तब हम लोगों से बयां किया था जब निम्मो हवेली जैसी घर की चहारदीवारी में कैद कर दी गयी थी उस पर से नौकरों का सख्त पहरा . घर से निम्मो का निकलना बिल्कुल ही बंद कर दिया गया था .निम्मो इन्हें और ये निम्मो की एक झलक पाने के लिए इतने आतुर और बेक़रार हो गये थे कि उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी ,अस्त व्यस्त कपड़ों से उनकी दीवानगी का हाल साफ पता चलता ,यहाँ तक कि किसी के द्वारा भी अपनी सूचनाओं का आदान प्रदान नहीं कर सकते थे .पाबंदियों की मजबूत दीवारों में ही दबकर रह गईं दिल की जज्बातें और अहसास .शायद निम्मो के नजरबन्द होने के बाद वो दोनों आपस में नहीं मिल पाए ,शायद कड़ी निगरानी से पहले वाली मुलाकात ही उनकी आखिरी मुलाकात थी .
     उमर के चढ़ते हुए पायदान की नासमझी ने सारी सीमाएं तोड़ डालीं थीं .ये दोनों हदों के इतने पार थे कि कोई भी पहलू अछूता नहीं बचा था ,बचा था तो बस वैवाहिक रस्में .ये सब बातें हम दोस्तों को तब पता चलीं थीं जब निम्मो को सख्त पहरों और सख्त हिदायतों के बीच एक दुसरे की नज़रों से दूर कर दिया गया था ,और विवेक भैया दीवानों की तरह बेहाल और बेचैनी का शिकार हो गए थे ,उस समय निम्मो जी .जी .आई .सी .इन्टर मीडिएट की छात्रा थी और हम लोग दयानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय में ग्रेजुएशन की सेकेण्ड ईयर की पढ़ाई आरम्भ किये थे .कहते हैं ना कि जब पानी सर से ऊपर हो जाता हैं तो रहस्य छुपाना मुश्किल हो जाता है .और घर की बुराई सबसे पहले मोहल्ले वालों को और दुनिया को पता चलती हैं तथा पूरी तरह छीछालेदर के बाद घर वालों को .इज्ज़त के सामने पढाई भी आड़े नहीं आई कारण स्कूल के बहाने आये दिन दोनों का साथ साथ गुलछर्रे उड़ाना दुनिया वालों की निगाहों का कुतूहल बन गया था ,आखिर कब तक राज पर पर्दा पड़ा रहता ,उन दोनों की अंतरंगता के ऐसे भी वाकये आंटी ने बताये जिसे सुनकर यही उचित लगा था कि शादी ही इस तरह के वारदात का अंतिम विकल्प है .आंटी कहती थीं कि बेटे की ख़ुशी के लिए हमें कुछ नहीं चाहिए बस व्याह के नाम पर एक चुनरी में भी निम्मो को उसके परिवार वाले विवेक को सौंप दें हम स्वीकार कर लेंगे .चुपके से ढंके हुए लहजे में यह भी बताया था कि अब तक तो हमारा पोता इतना [जमीं से थोड़ा हाथ ऊपर उठाकर] बड़ा हुआ होता ,शायद ऐसा कई बार हुआ था .उन लोगों को यह भी विश्वास था कि रिश्तेदारी के नाते कोई व्यवधान नहीं आएगा .पर निम्मो के घर वालों को यह कत्तई मंजूर नहीं था कि बन ठन कर सड़क की खाक छानने वाले निहायत निठल्ले विवेक भैया को अपनी बेटी सौंपे देंवें .आखिर नामीं गिरामीं हस्ती वाले जो ठहरे।
    विवेक भैया के जीवन में उस समय ऐसे बवंडर आये जिसमें प्यार की बुनियाद ही ढह गयी ,कई वर्षों का संजोया सपना तहस नहस हो गया .दोनों घरों में दुश्मनी की दीवार खड़ी हो गई कभी ना पट सकने वाली गहरी खाई, जिसका हश्र  दोनों को आजीवन जुदाई का गहरा सदमा देने वाला साबित हुआ .यह वृतांत सूनकर तब काफी दुःख हुआ था .वो कहते हैं ना ईश्वर जो भी करता है अच्छे के लिए ही करता है .हो सकता है रईस खानदान की बेटी जिंदगी भर दर्द देती दूसरी इकलौती अनाकर्षक नैन नक्श वाली बेटी धनदौलत के साथ साथ शांति से घर की गाड़ी खींच रही है .वही विवेक भैया आज भी बेरोजगार हैं ,ठेकेदारी करके घर की नैया किसी तरह खे रहे हैं ,उन्हें आज नए अवतरण में देखकर हर्ष भी हुआ विषाद भी।हमारे ज़माने वाली धमक और ठसक नहीं दिखी उनमें .उनका निठल्ला पन ही उनको उनके प्यार से वंचित कर दिया .काश उस समय वह अपने करियर के विषय में सीरियस रहे होते और अपने बड़े भाई के समकक्ष खड़े हुए होते .रिश्तेदारी भी बरक़रार रहती और निम्मो भी हासिल हो जाती .
        ये सारी बातें भैया ने खुद ही हम सबसे साझा कीं थीं .मुझे आज भी याद है वो और उनके चार और दोस्त शहर के नामचीन चर्चित चेहरों में शामिल हुआ करते थे .जिधर से गुजरते सड़कें गुलजार हो जातीं .उस समय हम लोग भी उम्र के उस दहलीज पर थे जहाँ ये सब अच्छा लगता था .छुट्टी के समय जब लड़कियों का झुण्ड स्कूल से बाहर निकलता ये सभी दोस्त फब्तियाँ  कसने से बाज नहीं आते थे .लेकिन एक बात जरुर थी कि मैं जब उस ग्रुप में होती भैया चुपके से खिसक लेते .ऐसा नहीं था कि उन्होंने मुझे कभी कमेन्ट पास नहीं किया था .तब वो मुझे जानते नहीं थे दरअसल मेरे अपने बड़े भैया के वह जूनियर थे .जान लेने के बाद बहन का दर्जा उन्होंने  तथा उनके दोस्तों ने भर पूर दिया ,क्या मजाल कोई मुझे कुछ कह दे .एक बार तो उन्होंने मेरे लिए कालेज में फसाद भी कर लिया था ,शायद लाइब्रेरी जाते समय किसी ने कुछ फिकरा कस दिया था मुझे तो नहीं पता चला था पर उन्होंने सुन लिया था और जमकर धुनाई किया था .उनकी पैनी निगाह मुझपर रहती और पीछा करने वालों पर भी .मुझे भी गर्व होता मैं कितनी खास हो गयी हूँ .
    उसी समय की बात है एक रोज मैं और मेरी सहेली पद्मा कालेज से घर जा रहे थे एकाएक विवेक भैया साईकिल रोककर गिड़गिडाते हुए सामने खड़े हो गए .कहने लगे श्यामला बहिनी मेरा एक छोटा सा काम कर दे तेरा यह एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगा .वो मुझे बहिनी ही कहा करते थे .मैं हक्का बक्का उनका मुँह देखने लगी,कारण उस समय सड़क पर किसी लड़के से खुल्लम खुल्ला बात करना चर्चा का विषय बन जाता था ,फिर भी मैं उनकी याचना के आगे नत हो गई ,पूछी क्या बात है भैया आप इतनी हड़बड़ी में क्यों हैं ,उन्होंने पाकेट से एक कागज का पुलिंदा निकाला और मुझे पकड़ाते हुए कहा बहिनी किसी भी हांल में इसे निम्मो तक पहुंचा दे बहुत बड़ा उपकार होगा .हम दोनों सहेलियां घर का रुख ना कर निम्मो के घर पहुँच गयीं ,जहाँ पर परिंदे को भी शक की निगाह से देखा जा रहा हो सीधा तो मिलना दूर ,निम्मो का नाम ले लेने पर ही हजारों सवाल ,पहले तो नौकरानियों से सामना हुआ ,फिर उनने घर की औरतों को बुलाया ,एक साथ दो तीन औरतें पधारीं ,जैसे कोई बहुत बड़ा हादसा हो गया हो ,निम्मो की निगहबानी में बारीक़ से बारीक़ संशयों को भी खंगाला जाता .सामने पड़ते ही इतने सवाल इतनी जिरह कि कंपकपाहट छुट गई .जब कि निम्मो को हम लोगों ने करीब से कभी देखा नहीं था ,देखा भी था तो बस एलबम में विवेक भैया के साथ हर पोज में तस्वीरों में,और वो तस्वीरें भी क्या माशाल्लाह जैसे फ़िल्म के किसी हीरो हिरोइनों सरीखी लाजवाब ,सचमुच उन दोनों के बीच की इतनी गहरी नजदीकीयों को देखकर यही दिल से दुआ निकली थी की इनका एकाकार होना ही वाजिब करें भगवान .
    हाँ तो निम्मो से मिलने वाली बात की चर्चा को आगे बढाती हूँ ,उसकी माँ और चाची ने हमारा पूरा निरीक्षण किया ,फिर पूछा निम्मो से क्या काम है ,हाथ की मुट्ठी बँधी ,चेहरे पर हवाईयां ,बस इतना ही निकला वो निम्मो बहुत दिनों से कालेज नहीं जा रही ना इसीलिए हम मिलने आये हैं , उनकी उपस्थिति में ही निम्मो बुलाई गई ,पत्रवाहक अपना काम कैसे करे ,असमंजस की स्थिति ,निम्मो भी भौंचक्की हम सब कौन ,हलके से आँख का इशारा .पूरी तरह आश्वस्त होकर माँ चाची तो चली गयीं पर काम करती हुई दो तीन कामवालियों  की मौजूदगी ,काम को अंजाम देना बहुत दुरूह था ,पलक झपकते ही अपनी मुट्ठी खोल निम्मो की मुट्ठी बंद कर बनावटी बातों का लच्छा,आजकल कालेज क्यूँ नहीं जा रही हो ,सारा माजरा उसकी भी समझ में आ गया. इस प्रकार मैं भी विवेक भैया के प्यार के लिए मध्यस्थता का काम कर किसी ना किसी रूप में उनके इस अधूरे प्यार की कड़ी जरुर रही ,उसके बाद क्या हुआ नहीं मालूम .लेकिन लगता है यह आखिरी सन्देश था ,निम्मो की तरफ से तो असंभव ही लगता है , इसका जवाब तो नहीं ही आया होगा ,उसका डाकिया कौन बनता .
     वी .ए .की पढाई समाप्त फिर बी .एड .करने के लिए अलग संस्थान में प्रवेश .साथ साथ एम .ए .में भी एडमिशन ले लिया था पुराने संस्थान में ही ,क्यों कि सेशन लेट था इसलिए दोनों डिग्रियाँ तीन साल में पूरी हो जातीं .सुचारू रूप से एम .ए .की क्लासेज मैंने नहीं कीं,इसीलिए विवेक भैया से फिर कभी आमना सामना नहीं हुआ .दोनों ही संस्थान विपरीत दिशा में थे ,वैसे भी बी .एड .की पढ़ाई में व्यस्तता थोड़ी ज्यादा ही थी  शिक्षा के दौरान ही शादी फिर ससुराल का चक्कर और दूसरी दुनिया का कोना .बहुत दिनों बाद पता चला कि निम्मो की शादी किसी बहुत बड़े घराने में इन्जीनियर लड़के के साथ हुई है ,शादी भी सख्त पहरों के चाक चौबन्द में ,पुलिस वालों की चारों तरफ घेराबंदी ,इसलिए कि विवेक भैया कोई बखेड़ा ना खड़ा कर सकें .इन सब स्थितियों से बचने बचाने के लिए ही उन्हें जबरन किसी दूसरे शहर भेज दिया गया था ,निम्मो के घर वाले बहुत ही शक्तिशाली और ऊँची पहुँच वाले थे ,अंकल आंटी का सहम जाना लाज़िमी ही था .घर में बड़े भैया भाभी का रोल उत्तरदायित्वों के नाम पर नगण्य था .जब धन बल का अभाव होता है तो इन्सान असहाय हो जाता है दिन रात साथ घुमने वाले दोस्त भी क्या कर सकते थे ,बाहुबलियों से जंग छेड़ना हर किसी के बस की बात नहीं होती .फिर भी विवेक भैया ने निम्मो को जीवन संगिनी बनाने की हर सम्भव कोशिश की थी .निम्मो के हाथ पीले हो गए थे .विवेक भैया लड़ते लड़ते शायद थक गए थे .जीवन में उदासी और मायूसी के आलावा कुछ शेष नहीं बचा था .शहर लौटने पर उनकी दुनिया वीरान हो चुकी थी ,जिंदगी के नाम पर सबसे हसीन चीज ही लुट   .
     गयी थी .आशा की हर किरण धुंधला चुकी थी ,निम्मो के सम्बन्ध में तो कुछ नहीं जान पाई ,हाँ यह अवश्य महसूस किया कि लड़कियों के त्याग समर्पण के पीछे कितना दर्द छिपा होता है ये तो उनकी अंतरात्मा ही जानती होगी .विवेक भैया की बदहाली तो सब लोग देखते रहे होंगे पर निम्मो की तड़पन और कराह तो पहरों की सख्त दीवारों से ही टकराकर रह गयी होंगी .आज निम्मो के लिए उसका पति ही सब कुछ होगा और विवेक भैया के जीवन में बे डील डौल आकर्षण विहीन पत्नी और अपने दो बच्चे ही सब कुछ होंगे . अतीत के बीते हुए पन्नों पर,लम्हों पर धूल की एक मोटी पर्त चढ़ गयी होगी ,पर उन यादों का क्या होता होगा जब वक्त बेवक्त बिजली की तरह कौंधती होंगी .एक ही मोहल्ले में रहते हुए ससुराल से आने पर करीबी रिश्तेदार होने के नाते पारिवारिक समारोहों में क्या विवेक भैया और निम्मो का आमना सामना नहीं होता होगा ,और यदि तुक से होता भी होगा तो उस घड़ी का अहसास कैसा होता होगा .इस तरह के प्रेम प्रकरण का किस्सा हमारे समय का ,मेरे जानने में शायद यह पहला था की प्रेम डगर पर कोई इतना आगे निकल गया हो जिसमें पीछे मुड़ कर देखना जिंदगी भर के लिए बे आवाज नासूर ही बचा रह गया हो .आज के जमाने के लिए यह कोई विशेष बात नहीं है ,आज का तो परिदृश्य ही पूरा का पूरा बदल गया है .कहीं-कहीं तो सख्तियों का आचरण भी चौंकाने वाला लगता है ,किसी को भी आज फूर्सत नहीं किसी के विषय में गहन छान बीन करने की ,मोबाईल ने सारी गोपनीयता हजम कर ली है , तभी तो आज मान सम्मान और प्रतिष्ठा के कुछ  मायने ही नहीं रह गए हैं।  हमारे समय में तो किसी मनचली का मामूली ख़त भी हंगामा और बवाल बरपा देता था ,इसीलिए विवेक भैया के आलावा इस तरह का प्रकरण संज्ञान में कभी नहीं आया था।
    विवेक भैया तो हंस बोलकर चाय पानी पीकर चले गए ,बेटा आशीर्वाद लेकर चला गया ,छोड़ गए तो मुझे उन सुनहरे पलों के गोतों पर जहाँ खुद उनके द्वारा साझा किये गए स्मृतियों के तमाम अम्बार थे .जिंदगी कैसे कैसे खेल खिलाती है ,क्या सारी सीमाएं लांघने के बाद भी पीछे मुड़ना आसान होता होगा ,ऐसा नहीं है कि निम्मो के घर वाले इन सब बातों से अनभिज्ञ थे ,सब कुछ जानने के बाद ही तो पाँव में जंजीरें डाल दी गयी थीं ,पर सुना तो था की विवेक भैया बिल्कुल ही टूट गए थे ,शायद उन्होंने खुद से तथा समय से समझौता किया होगा तभी तो भाभी मेरी नज़रों पर नहीं चढ़ीं थीं .और घर का वातावरण उलाहना दे रहा था।

                                                                                                                                            शैल सिंह