Monday, 15 July 2013

जिंदगी का अनछुआ कोना

                     कहानी 

                                      जिंदगी का अनछुआ कोना 


 जिंदगी के इस मुकाम पर आकर पीछे मुड़कर देखता हूँ तो जीवन के सारे घटनाक्रम जीवंत हो उठते हैं। बात वहीँ से शुरू करता हूँ जहाँ से मेरी जिंदगी ने इस कहानी का शक्ल अख्तियार किया है बात सुनने में भले ही विशेष ना लगे पर मेरे जीवन पर उस वक्त ने जो ख़ास छाप छोड़ी उन्हीं  लम्हों का तराशा हुआ एक हिस्सा हूँ । वर्तमान के व्यक्तित्व को देखकर कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता कि मैं भी कभी ऐसा उद्यंड रहा होऊंगा। मेरी प्राम्भिक आधारशिला को किन इंट गारों ने अपनी परवरिश में खड़ा किया उनके विषय में यदि चर्चा नहीं करूँगा तो समझिये उन योगदानों की तौहीनी होगी।
   मेरे अपने पिताजी का ऐसा विश्वास था कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है ,शिक्षा ही एक ऐसा हथियार है जिससे जीवन में सब कुछ पाया जा सकता है ,और उन्होंने परिवार में शिक्षा के उन्नयन के लिए सामर्थ्य अनुसार जीतनी उनकी क्षमता थी ,कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।यूँ तो हमारा परिवार बहुत ही बड़ा तथा निम्न मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार था जहाँ पैसे का उपयोग उचित रूप से बहुत ही आवश्यक आवश्यकता के लिए ही हो पाता था। हमारे पिताजी चार भाई थे। बड़े पिताजी के बड़े पुत्र जो उम्र में मुझसे लगभग पाँच वर्ष बड़े थे। उनकी प्राम्भिक शिक्षा मेरे पिताजी जो कि प्राम्भिक विद्यालय में अध्यापक थे,उनके ही देख-रेख में हुई। मेरे पिताजी दूसरे नम्बर पर थे ,उनके अथक परिश्रम का असर मेरे बड़े भाई साहब के जीवन पर पड़ा या नहीं यह तो वही जानें,वैसे वह आज भारत सरकार में उच्च पद पर आसीन हैं, पर मैं तो यह अवश्य कहूँगा कि मेरी प्राथमिक शिक्षा पिताजी के सख्त अनुशासन से ही संभव हो पायी। पिताजी शिक्षा के प्रति बहुत ही गंभीर थे। लेकिन मेरी पढ़ाई लिखाई में बिल्कुल ही रूचि नहीं थी,इसके लिए मैं प्रायः रोज ही पिताजी के गुस्से का शिकार होता था और यह क्रम लगभग कक्षा पांचवीं तक चला। उस बाल मन की बात क्या बताऊँ तब यही सोचता था कि बड़ा होऊँगा तो मैं भी इनकी अच्छी खातिरदारी करूँगा। उसके बाद तो कक्षा छः में प्रवेश मिला और पिताजी के चंगुल से थोड़ा आजाद हुआ। इस आजादी में तो मैं पढ़ाई से बिल्कुल ही विमुख होने लगा कारण मेरा स्वभाव ही पढ़ने वाला नहीं था।मन उड़ा-उड़ा सा रहता ,पढ़ाई को गंभीरता से कभी लेता ही नहीं था।
   पिताजी की अत्यंत सख्ती कहें या बेमन से ही सही उनके द्वारा डाली गयी प्राम्भिक शिक्षा की मजबूत नींव,ने तो किसी तरह कक्षा आठ की गाड़ी खींच लिया,तत्पश्चात माध्यमिक शिक्षा हेतु लगभग चार किलोमीटर दूर स्थानीय बाजार में स्थित माध्यमिक विद्यालय में प्रवेश लिया,फिर तो पिताजी के कोपभाजन से बिल्कुल ही मुक्त हो गया तथा इस बीच उद्दंडता की सारी हदें पार करता रहा। यहाँ तक कि भूत प्रेतों का भय भी मुझे डरा नहीं सका। भयहीन होकर मैं रात-रात भर कभी-कभी आस-पास के गाँव में नौटंकी देखने जाया करता,पर हाँ पिताजी की मार का भय इतना था कि घर के सभी सदस्यों के सो जाने के बाद ही जाता और उन लोगों के प्रातः उठने से पहले ही आ जाता था और वो भी अकेला,कारण यदि किसी का साथ पकडूँगा तो भेद खुल जाएगा। पांव में जूता,चप्पल नहीं,साँप-बिच्छू का डर नहीं। आज जहाँ हूँ कभी-कभी सोचता हूँ क्या दादी के सूझबूझ के बिना यह सुनहरा अवसर सम्भव हो पाता,क्योंकि गाँव के वातावरण में मैं अपने को पढ़ने की ओर बिल्कुल ही उन्मुख नहीं कर पाता,चाहे पिताजी का डंडा कितना भी ऊपर बरसता। ये सब हरकतें दादी और पिताजी से छुपी नहीं थीं,बस पिताजी को इंतजार था तो दसवीं की परीक्षा फल का , कुढ़-कुढ़ कर पिताजी कोसते और धमकियां देते रहते थे,कहते आने दो रिजल्ट फिर हजामत बनाता हूँ। शायद उनको पहले से ही यह आभास था मेरा हव-भाव देखकर कि आगे जो भी होगा उनकी कल्पनाओं पर तुषारापात करेगा। वह शिक्षा के प्रति इतने दृढ़संकल्प थे कि इसके आगे उन्हें कुछ सुझता ही नहीं था घर के सभी बच्चों को शिक्षित करने के लिए स्वयं से ही इतने प्रतिबद्ध रहते थे कि शाम होते ही लालटेन और छड़ी लेकर बैठ जाते थे पढ़ाने ।
       मेरी दादी जी यद्यपि जो कि स्कूल के कभी दर्शन नहीं की थीं,शिक्षा के नाम पर ककहरा तक नहीं जानतीं थीं फिर भी वह अपने पोतों को पढ़ने लिखने के लिए बहुत प्रेरित करतीं थीं वह अपने पोतों के लिए बहुत ही समर्पित थीं और चाहतीं थीं कि मेरा घर गाँव,समाज में आगे बढ़े। घर की आर्थिक स्थिति बिल्कुल ही डांवाडोल थी। पिताजी की पीढ़ी ने अभावों में ही आँखें खोली थीं और इस स्थिति का दंश गाँव के रईस लोगों के मध्य उन्होंने कदम-कदम पर महसूस भी किया। इन लोगों के बचपन में ही दादाजी स्वर्ग सिधार गए थे। इस लड़खड़ाती हुई नैया का सारा बोझ बड़े पिताजी के कंधे पर आ पड़ा,तब उनकी आयु मात्र बीस,बाईस साल की रही होगी। उन्होंने अपने छोटे भाई-बहनों का भी उत्तरदायित्व बखूबी निभाया। बड़े पिताजी दादी को किसी देवी के समान पूजते थे,यदि दादी ने कुछ कह दिया तो समझिये वह उनके लिए ब्रम्हवाक्य हो जाता और दादी के उसी आदेश का मैं भी एक नमूना हूँ। मैंने अपने जीवन में कोई ऐसा वृतान्त नहीं देखा जहाँ बड़े पिताजी ने दादी की किसी बात की अवहेलना की हो। और यह माँ-बेटे के बीच का क्रम दोनों के जीवन पर्यन्त तक चला । दादी की मृत्यु के बाद बड़े पिताजी ने कहा भी था कि हम सबके जीवन में पिता का रोल भी माँ ने ही निभाया था।
   जो बात मैं कहना चाहता हूँ वो यहाँ से आरम्भ होती है। मेरे एक चाचा जो दिल्ली पुलिस में नौकरी करते थे औए गर्मीं की छुट्टियों में घर आये हुए थे। वह जब भी गाँव आते थे तो ससुराल अवश्य जाते थे उनकी ससुराल आजमगढ़ कस्बे के बगल में ही स्थित एक गाँव में थी और सौभाग्य से बड़े पिताजी की नियुक्ति भी आजमगढ़ कस्बे में ही थी।
    अब मैं असली मुद्दे पर आता हूँ। यहीं से मेरी जिंदगी का नया अध्याय शुरू होता है। मेरी दादी जो कि पिताजी के अतिशय कोपभाजन से मुझे बचाना चाहती थीं क्योंकि उन्हें भी मेरे लक्षण रंग-ढंग साफ दिखाई दे गए थे। चाचाजी घर से जब ससुराल के लिए निकले तो दादी ने उन्हें रोककर कहा कि इस नालायक शैतान [मैं] को भी लेते जाओ और बाबु [बड़े पिताजी] के पास छोड़ देना नहीं तो मास्टर,मेरे पिताजी को मास्टर नाम से ही लोग जानते थे, इसकी हड्डी-पसली एक कर देंगे।
  इस प्रकार एक जून उन्नीस सौ चौहत्तर को मुझसे मेरा घर दादी ने छुड़ा दिया।वहां जाकर भी मैं जीवन के प्रति गंभीर नहीं था।दादी की दूरदर्शिता से तो मैं बड़े पिताजी की सानिध्य में पहुँच गया। और वहां पहुँचने के बाद वह दिन आ ही गया जिसका मेरे पिताजी को बड़ी बेसब्री से इंतजार था,लेकिन मुझे तो दादी ने पिताजी की पहुँच से दूर कर दिया था,अंत में वही हुआ जिसका आंकलन पिताजी ने और सभी लोगों ने किया था। मुझे आज भी याद है नौ जून उन्नीस सौ चौहत्तर का वह दिन,जिस दिन हाई स्कूल का परीक्षा परिणाम आया था और मेरा प्रदर्शन बेहद ही ख़राब और निराशाजनक था। मैं तो अपनी करतूतों का गवाह था, पर बड़े भैया भी बेहद दुखी हुए थे। लेकिन यह क्या जैसे मुझसे कोई अदृश्य शक्ति कह रही हो उठो और भविष्य के प्रति सचेत हो जाओ। एकाएक उद्दंडता से शालीनता और पढ़ाई के प्रति गंभीरता कैसे आई ये तो ईश्वर ही जानें,पर मैंने उसी दिन से जी तोड़ मेहनत करने और आगे बढ़ने का वीणा उठा लिया और वहीँ रहकर पुनः लगभग एक महीने बाद आठ जुलाई उन्नीस सौ चौहत्तर को दसवीं में प्रवेश लिया।पढाई शुरू होने के साथ ही मैं पूरी लगन शीलता से स्वयं के प्रति तथा शिक्षा और शिक्षकों के प्रति पूर्ण समर्पित हो गया। मैं क्या से क्या हो गया,मुझे आज भी याद है कि शिक्षक सभी से कहते फिरते कि यह आश्चर्य जनक लगता हैं कि कैसे यह परीक्षा में असफल हुआ था,और यह आवाज मात्र एक महीने के परिश्रम का फल थी।पर मैं जानता हूँ कि पिताजी की डाली हुयी मजबूत नींव तथा बचपन में रोज ही पढ़ाई के लिए मार खाई गयी जबरदस्ती की थोपी हुयी,घुट्टी पिलाई हुयी शिक्षा का यह असर था।ठीक पांच महीने बाद अर्धवार्षिक परीक्षा हुई और मेरे अथक परिश्रम का परिणाम आँखों के सामने था । विद्यालय में प्रथम स्थान पाने का गौरव प्राप्त हुआ। परीक्षाफल की उत्तर पुस्तिकाएं घर ले जाने को मिलीं।बड़े पिताजी जो कि हर शनिवार को गाँव जाया करते थे दादी से मिलने एवं परिवार की देख-रेख के लिए,सो मेरी परीक्षाफल की कापी भी साथ लेते गए मेरे पिताजी को दिखाने के लिए।
   कुछ दिन के बाद मैं भी डरते-डरते गाँव गया,लेकिन पिताजी का बदला हुआ स्वरूप देखकर बहुत अच्छा लगा उन्होंने कुछ नहीं कहा ,बल्कि दादी भी बहुत प्रसन्न हुईं। मेरा पूरा व्यक्तित्व ही बदल चुका था,शायद मैं अब अपने लिए पढ़ने लगा था। इस प्रकार पुरे लगन और परिश्रम से मैंने पूरे विद्यालय में दसवीं में प्रथम श्रेणी में एवं प्रथम स्थान प्राप्त किया। जबकि प्रारम्भ में उस विद्यालय में प्रवेश के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े थे। अब ये नौबत आ गयी थी कि शिक्षक अगली शिक्षा के लिए किसी दूसरे विद्यालय में प्रवेश के लिए जाने से रोकने लगे, कारण उस स्कूल के मेधावी छात्रों में मैं शूमार हो गया था। अंत में पुनः मैंने उसी विद्यालय में प्रवेश लिया।आगे चलकर इन्टर मिडिएट में भी मैं सर्वश्रेठ अंकों से उत्तीर्ण हुआ और पूरे स्कूल में अव्वल रहा। यद्यपि थोड़ी बहुत जो भी कामयाबी मिली उसमें परिवार के सभी सदस्यों का किसी ना किसी रूप में योगदान रहा। परन्तु दादी की दूरदर्शिता का आज भी मैं कायल हूँ कारण जिनके एकमात्र निर्णय से [मेरे पिताजी की मार से बचाने के लिए] मेरे जीवन की दिशा एवं दशा ही बदल गयी। ना वो  मुझे बड़े पिताजी के पास भेजतीं और ना ही मेरे दिमाग का कपाट खुलता। हालांकि सुधरने के बाद मैं कुछ और ही बनना चाहता था पर बन गया कुछ और। फिर भी अपने इस कर्म क्षेत्र से काफी संतुष्ट हूँ। ईश्वर ने जो भी किया वह अच्छा ही किया। जब मैं जीवन का विश्लेषण करता हूँ तो पाता हूँ कि आज जिस जगह पर खड़ा हूँ शायद यही जगह मेरे लिए उपयुक्त है,मेरे स्वभाव के अनुरूप है। मेरा पूरा जीवन ही संघर्षों भरा रहा है,मुझे आसानी से कोई भी चीज हासिल नहीं हुई। पर जो कुछ भी चाहा देर से सही वह मिला तो अवश्य।
    अपने जीवन के सेवा क्रम में विभिन्न पदों पर सेवा देते हुए तीन विश्वविद्यालयों में एवं वर्तमान में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के दूसरे संस्थान में विभागाध्यक्ष पद पर कार्यरत हूँ। एक गाँव के निहायत बिगड़ैल बालक से उठकर उत्थान के इस मोड़ पर आकर प्रायः दादी की तस्वीर के सामने अहर्निश खड़ा हो जाता हूँ और अश्रुपूरित नेत्रों से नमन करता हुआ निहारता हूँ। दादी अब इस दुनियां में नहीं हैं लेकिन उनकी लगायी हुई बाग़ हरी-भरी एवं लहलहा रही है। जिसे देखकर शायद वह स्वर्ग में भी खुश हो रही होंगीं। जर्जर और मेरुदंड विहीन स्थिति से उबरकर आज हमारा परिवार प्रतिष्ठा के जिस डगर पर अग्रसर हो रहा है उसका सारा श्रेय बड़े पिताजी एवं दादी को दूंगा,क्यों कि उन्हीं लोगों के त्याग और संरक्षण में इस घर की मान-मर्यादा को उचित आयाम मिला।परिवार के और लोगों के विषय में तो मैं नहीं जानता,लेकिन बड़े पिताजी मेरे आदर्श थे,हैं और आजीवन रहेंगे। मैं आज भी उन्हीं के आदर्शों का अनुपालन करता हूँ और करता रहूँगा। उनका स्मरण कर लेने मात्र से ही मुझे स्फूर्ति और उर्जा मिलती है। बड़े पिताजी ने अपने जीवन को शीशे की तरह पारदर्शी रखा। उनके पूरे जीवन की कार्यशैली ही प्रभावित करने वाली थी।उनकी बेदाग छवि और उनका कर्मठी व्यक्तित्व ही अपने आप में एक पहचान थी। वह कभी किसी की कृपा के मोहताज नहीं रहे।उनका अपना जीवन जीने का एक तरीका था। बहुत ही रिजर्व रहते थे,उनकी संगत का ही असर था कि हम लोगों पर किसी बाहरी अराजकता का कोई बुरा असर नहीं पड़ा।उनके अति सख्त अनुशासन में ही हम लोग आज निखर कर इस दहलीज पर पहुंचे हैं। दादी और बड़े पिताजी के विषय में बात करने पर बहुत गर्व महसूस होता है। बड़े पिताजी के पदचिन्हों पर चलना ही उनके प्रति मेरी सच्ची श्रद्धांजलि होगी । मुझे संतोष है कि उनके जीवन के अंतिम क्षणों में मैं उनके पास था। पता नहीं क्यों मुझे यह आभास होता है कि मैं उन्हें जितना चाहता था शायद वह भी मुझे उतना ही चाहते थे,तभी तो मरणासन्न अवस्था में भी उनके प्राण मेरे लिए अटके हुए थे। वैसे तो बीच-बीच में मैं कई बार उन्हें देखने गया था। अंतिम क्षणों में जब मैं उनके पास पहुंचा उन्होंने अबोले मूक ,मुझे जी भरकर देखा,तत्पश्चात उनके प्राण पखेरू उड़ गए। वहां मौजूद सभी लोगों ने यही कहा शायद मौत के करीब आकर भी तुम्हारा ही उन्हें इंतजार था। मैं आज जो भी हूँ उन्हीं की बदौलत हूँ यदि वह दादी का मान ना रखकर मुझे अपने पास रखने से इन्कार कर देते तो,अपनी अनुशासन की कठोर छत्र छाया से दूर कर देते तो,मैं गाँव का वही निठल्ला गया गुजरा इंसान ही हुआ होता।
   मैंने जितना करीब से उन्हें और उनके जीवन को देखा और जाना है शायद उनकी अपनी औलादें भी उतनी गहराई से उनके जीवन के मर्म को नहीं जानती और समझती होंगीं,कारण निज के माँ-पिताजी तथा घर के और सदस्यों के स्नेह एवं वात्सल्य से दूर मैं बड़े पिताजी के ही संसर्ग का आदी हो गया था। जीवन के एक पहलू से विमुख होकर [खेलना कूदना शरारतें कोई संगी साथी नहीं इत्यादि ] बस घर से स्कूल,स्कूल से घर।घर की चारदीवारी के आलावा बड़े पिताजी का सानिध्य और जी लगा कर एकाग्र होकर पढ़ना ,यही मेरी दिनचर्या थी। बहुत हुआ तो पास में स्थित एक मंदिर में चला जाया करता था और वहां के पुजारी के पास बैठकर भगवान को स्मरण करता। कहीं और ना जाकर यही एक ठिकाना था जहाँ मुझे असीम शांति मिलती थी। मैं घर परिवार की प्रतिष्ठा को बरकरार रखने का प्रयास जीवन पर्यन्त करता रहूँगा। दादी और बड़े पिताजी की स्मृतियाँ मुझे जीने की प्रेरणा देतीं हैं। मैं अपने बड़े पिताजी और दादी के मार्गदर्शन की चर्चा अपने दोनों बच्चों से भी करता हूँ,ताकि वह भी इससे प्रेरणा ले सकें। और बड़े पिताजी द्वारा मुझमें डाले गए आदर्श और संस्कार का अनुशरण कर सकें।
       मेरे अपने पिताजी ने भी हम घर के बच्चों को शिक्षित दीक्षित करने के लिए काफी त्याग किया। कभी अच्छा खाना पहनना उनके जीवन का शगल नहीं रहा था,था तो घर परिवार का स्तर ऊँचा करने की अकूत लालसा । वह कहा भी करते थे कि हम जीने के लिए खाते हैं,खाने के लिए नहीं जी रहे। आज वह भी हम सबकी तरक्की देखने के लिए इस दुनिया में नहीं हैं। मैं अपनी नौकरी के कारण हमेशा माँ पिताजी से दूर रहा। माँ जो कभी-कभी हम लोगों के दूर रहने के कारण अशांत हो जाती थीं तो पिताजी उन्हें सांत्वना देते,कि हम लोग तो पके आम हैं बच्चे सुखी रहें यही हम लोगों की कामना रहे।उनकी दी हुई प्राम्भिक शिक्षा ने पौधे की जड़ में खाद पानी का वह काम किया है कि इतने बड़े परिवार में आज कोई भी अशिक्षित और बेरोजगार नहीं हैं। गाँव के जिन बाबू साहब लोगों में हम लोगो की गिनती नगण्य थी आज वही लोग हमारे परिवार को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। अच्छी हैसियत और रसूख रखने वाले लोगों की स्थिति अब दयनीय और बदतर हो चली है।घर की दयनीय स्थिति होते हुए भी बड़े पिताजी और चाचाजी लोगों में कभी हीन भावना नहीं पनपी और ना ही हम सभी भाईयों में पनपने दीं। स्वाभिमान को किसी भी हालत में आड़े नहीं आने दिया। खुद निम्न श्रेणी का खा पहन कर हम लोगों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजा,हम लोगों को कभी कोई कमीं नहीं आने दी। दुःख है तो इस बात का कि विपन्नता में आँखें खोलने वाले आज हमारी सम्पन्नता और वर्तमान को देखने और भोगने वाली आँखें पञ्चतत्व में विलीन हो चुकीं हैं। रह-रह कर उन लोगों के दुःख भरे दिन मानस को कचोटते हैं। काश आज दादी जिन्दा होतीं,मैं उन्हें पलकों पर बिठाता ,आँखें भर आयीं। दादी अपना आशीर्वाद आने वाली पीढ़ियों पर भी बरकरार रखना।
        
                                                                             शैल सिंह