Thursday, 31 January 2013

मेरी ग़जल

'' ग़जल''

ज़ख्म गहरा दिया है तुमने
       मेरे ऐतबार को
सिला कैसा दिया है तुमने
      मेरे इन्तजार को
         ज़ख्म .......


लब हैं खामोश लहर सीने में
      उठा देखा कि नहीं
तुफां  का  कहर  कश्ती  पे
     बरपा देखा कि नहीं
सहना देखा सितम का उफां
   ज्वार का देखा कि नहीं 


सब्र कैसा दिया है तुमने
   मेरे इख़्तियार को
       ज़ख्म ........


बेरुखी क्यों वजह क्या आख़िर
     कुछ तो बता दिया होता
शीशा-ए-दिल टूटने से पहले
     खुद को समझा लिया होता
टुटा है भरम तेरा ऐ दिल,रस्क
     इतना ना किया होता 


किस खता कि दी सजा ऐ वफ़ा
       दिले बेक़रार को
            ज़ख्म ..........


अंजुमन में ख्वामखाह आना
     तरन्नुम बनके बेजां
बेवक्त बज्म से उठ के जाना
     रुसवा किया है बेजां
ग़म है नगमों से क्यों है छिना
    शाम-ए-करार बेजां 


दिया लम्हा उदास तुमने
      ऐसे फनकर को
          ज़ख्म .......... 

                                                  शैल सिंह