जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं
इतनी चुप और ख़ामोश क्यों हूँ कैसे बताऊं
दिल के टूटने की आवाज़ किसको दिखाऊं
हंसी की वजह जो थे हो गए किसी और के
वो खुश है भींगी ऑंखें मेरी क्यों कैसे बताऊं
निज को खो दिया जिसको पाने की खातिर
वही निकला बेवफ़ा दिल को कैसे समझाऊं ।
खुली ऑंखों में पले ख़्वाब परिहास करते हैं
होंठों पर मुस्कान का लिबास डाले फिरते हैं
कौन समझे मुस्कुराहटों में छिपे दर्द का मर्म
तुम नहीं साथ मगर एहसास लिए फिरते हैं
बेइंतहा दीवानगी की मिली ये सजा वफ़ा में
जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं ।
कितने बेखबर तुम हो मेरे दिल के तूफ़ान से
फासले कर लिये मिल के किसी अनजान से
किस दौलतमंद ने खरीद लिया है ज़मीर तेरा
नासमझ जान भी न पाई मैं क्या तदबीर तेरा
जबसे तेरी याद में मैंने भी तड़पना क्या छोड़ा
तबसे इस बेवकूफ़ दिल ने धड़कना ही छोड़ा ।
तदबीर--योजना, युक्ति
शैल सिंह
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