Friday, 27 February 2015

हमारे गाँव की होली

बदलते मौसम की तरह
बदल गए सब रीत रे
कहाँ वो फगुवा बैठकी
कहाँ जोगिरा गीत रे ,

'' हमारे गाँव की होली ''


ढोल,मंजीरे,झाल थाप पर
अब हुरियारों की टोली
झूमते,नाचते,गाते कबीरा
कहाँ हम जैसे हमजोली ,

गली,मोहल्ले की भऊजाई
खोल झरोखा ताक-झांक में
नटखट देवरा कब गुजरेगा
साँझ-सवेरे इसी फिराक में ,

डाल घूँघट मुख दौड़ें दुवारे
मुट्ठी मा करिया रंग दबाय ,
बुरा ना मानो होली है,बहुवें 
कहि बुढ़वों को देवर बनाय ,

कीचड़ सनी बाल्टी उँड़ेलें
नेह से माथ लगा के रोली
सारा रा रा होली है धुन पे
करें चुटकी काट ठिठोली ,

भिनुसारे से ही भांग-ठंडई
ओसारे,अंगना नाऊ कहार
रगड़-रगड़ सिलबट्टे घिसें 
सखी गा-गा मस्त मल्हार ,

करूँ अपने ज़माने की बातें
आज की नई पीढ़ी दे घघोट
पश्चिमी सभ्यता निगली जैसे
गमछा,धोती ,जनेऊ ,लंगोट ,

प्रीत के रंग में रंगे वो रिश्ते
बदरंग होकर गए महुलाय
वक़्त ने तेज़ी से रफ़्तार धरी
इक्क्सवीं सदी गई सब खाय ।
 
जब-तब यादें बहुत सताती
घिर आती हैं आँखों में घटा
रिश्तों में जो तब मिठास थी
अब कहाँ वैसी रंगों में छटा ,

                                  शैल सिंह