Sunday, 25 January 2015

बेमौसम तब घन बरसेगा

गुज़र गए जो लम्हें पल
लौट कहाँ अब आने वाले
उम्र की दरिया बहती जाये
वक्त कहाँ थम जाने वाले ,

मासूम बड़ा समझाऊँ कैसे 
इस उन्मत्त पखेरु मन को
तर को प्यासा सूखे सावन
जल के दो बूंद बस धन को ,

मौसम ने तो दगा दिया ही
पूरवा ने भी मुँह मोड़ लिया
चढ़ते सूरज की धूप सेंककर
संग गोधूलि में छोड़ दिया ,

हरी-भरी बाग़ों में हंसा भी
तब कैसा जाल बिछाता था
टहनी की हर कली-कली पर
तब भँवरा कैसा मँडराता था

खुदगर्ज़ बड़ा आवारा बादल
उसे क्या लेना बंजर विरवा से
आसें कछार सी हुई जा रही 
उसे क्या विरवा के हियवा से ,

शबनम की बूँदों से ढाढंस पा
तरू अर्धमूर्च्छित सा जीवित है
कोई ना जाने मौनव्यथा क्या
कब से मन विरहा यह तृषित है ,

हर आहट पर कातर उम्मीदें
चौखट तक जा फिर लौट आतीं
अंक निशा के करवट ले लेकर
रेशम सी चादर भींगा सुखातीं ,

किस घड़ी न जाने कब डोरी ये
टूट जाये साँसों की आहिस्ता
बेमौसम तब यह घन बरसेगा
जब होगी अर्थी अपने रस्ता ।

                                शैल सिंह