Saturday, 4 October 2014

मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया

हँसी के फौव्वारे ठहाकों की दुनिया
कहाँ खोई जाने चौपालों की दुनिया ,

ठहर सी गई आ कहाँ ज़िन्दगी ये
मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया ,

गुड्डे-गुड़ियों का खेल बन्ना-बन्नी के गीत
थाप ढोलक के नाचती नज़ारों की दुनिया ,

त्योहारों की रौनक वो गँवईं का मेला
फुलौड़ी,लकठा,जलेबी गुब्बारों की दुनिया ,

चवन्नी,अठन्नी में सारे ख़ुशी के सामा
ख़रीद सकती कहाँ अब दौलत की दुनिया ,

गिल्ली-डंडा,कबड्डी,ताश की वो दोपहरी
खेत-खलिहान,बगिया चहकती वो दुनिया ,

मोबाईल चाण्डालिन चुड़ैल टी.वी.,नेट ने
चट कर दी सामाजिक समरसता की दुनिया ,

लकठा-बेसन का बना हुआ गुड़ में पगा
       
                                                  शैल सिंह