Thursday, 19 June 2014

कल्पना का रूप

        (१ )

तुझे रिझाने मन्दिर आई
पूजा अर्चन थाल सजाई
हे निष्ठुर भगवान सुनो
मेरी रीति गागर भर दो ।

कैनवास के कोरे फ़लक पर
कल्पना ने इक चित्र उकेरा है
मन के भावों पर अनुरंग चढ़ा
तूलिका ने बहु रंग बिखेरा है ।

          (२)

जिस मंजिल की तलाश मुझे
ऐ  राह  ले  चल  उस   तलक
कब  तक  भटकना  है लिखा
किस  लोक  में  है मेरा जहाँ
मन  है  कि  सपना  बुन रहा
कहीं ठहरा नहीं है अब तलक ।

इक आयाम  चाहत को मिले
साकार  कल्पना  का  रूप हो
गुलशन  में  मेरी  जिदगी के
हर रंग ,छाँह ,खिली धूप हो
तूं तो मन की सब है जानता
ऐ रब दे मन का मेरे भूप हो ।
                                   शैल सिंह