Tuesday, 9 July 2013

ईश्वर भी इतना अस्मर्थ हुआ क्यों


उत्तराखंड की त्रासदी पर 

ईश्वर भी इतना अस्मर्थ हुआ क्यों


ओह,मेघा चाहा जलवृष्टि था प्रचंड जल प्रलय का ऐसा हाहाकार नहीं
सूखी बंजर धरती में अंकुर फूटे धन,जन क्षति का ऐसा चित्कार नहीं।

प्राकृतिक छटा के मोहपाश ने लील लिए बेकसूर जाने जीवन कितने
की आंकड़ा पार क्रूरता कह सिहर उठते हैं तड़प कर जीवित जितने।

देवभूमि दरश की भूखी आँखों का यम से यह कैसा साक्षात्कार हुआ
कुछ गए काल के गाल समा कुछ को भष्मासुर का क्रूर दीदार हुआ।

कैसे जज्ब करें अपनों के खोने का गम वादी ने आत्मसात किये हैं जो
रूह कंपाने वाली अलकनंदा,मन्दाकिनी ने बेदर्द वाहयात किए हैं जो।

भगीरथ तेरी उद्दंड भयावह क्रीड़ा विस्फारित आँखों ने देखा अचंभित
अथाह छलकाया था जल का सागर फिर भी प्यासा तरसा तन कम्पित।

जाने किस कन्दरा देव दुबक गए असहाय ,बेसहारा कर श्रद्धालुओं को
उत्पात हुआ केदारनाथ के गढ़ में जिंदगी की हवाले मिटटी बालूओं को।

ये कैसा आस्था का इतिहास रचा अपने अस्तित्व के होने या ना होने का
ये क्या अंधभक्ति का सिला दिया अद्दभूत शक्ति के होने या ना होने का।

भ्रम के भंवर में खा रही हिचकोले अब तो अति विश्वास की नैया जग की
जलाभिषेक करें उपवास,अर्चना,अर्पित,नैवेद्य शीश नवायें किस पग की।

अगर प्रकृति से खिलवाड़ हुआ तो प्रकृति ने भी जघन्य परिहास किया है
ईश्वर भी इतना अस्मर्थ हुआ क्यों, शरणागतों से बेरुखा उपहास किया है।
 
                                                                                    शैल सिंह