Sunday, 23 June 2013

ऐ कुदरत

''केदारनाथ घाटी की तबाही पर''

ऐ कुदरत तेरी कहर का मंजर अजीब देखा
लहरता तेरी तबाही का समंदर अजीब देखा
जल प्रलय के उमड़ते सैलाबों में निगाहों ने
विकराल तेरी बेदर्दी का बवंडर अजीब देखा।            

ऐ कुदरत तेरी तबाही का मंजर अजीब देखा
तेरी विनाशलीला का क्रूर कहर अजीब देखा
पल में जमींदोज नगर,खण्डहर अजीब देखा
प्रचण्ड प्रलय का लहर नजर से करीब देखा।

तेरी चंचल क्रीड़ा में समाहित जिन्दगानियों का रेला
तमाशबीन बना देखा मौत की आशनाईयों का मेला
बेघर हुए अनाथ कितने आंकड़े दफन तेरी मौजों में
सब कुछ गँवा कर लौटा घर बिलखता हुआ अकेला ।
                   
सर्द हवायें मुसलाधार वारिश का ऊफ तांडव नर्तन
लाचार खड़ा देखा भंवर में ऊफ करूँण रुग्ण क्रन्दन
उफनती जलधार में समाया धरा का वो हसीं जंगल
जिंदगी मौत के दरम्यान विवश ऊफ दर्दनाक रुदन ।

रौनक भरी वादी पल में पलीदा शमशान बनते देखा
सूखे पत्तों के मानिन्द भरभरा कर मकान ढहते देखा
तेरे सैलाब में देवभूमि का नामोनिशान मिटते देखा
मिथक विश्वास पे तेरे सवालिया निशान उठते देखा ।

मरघट सा फैला सन्नाटा कितनी स्तब्ध गुलज़ार घाटी
मौसम बना खलनायक दी कैसी तेरी आपदा ने त्रासदी
घर का चराग खोया,किसी ने हा कमाऊ पुत भाई खोया
पिता का सर से छिना साया मांग का सुहाग कोई खोया।

हैं दर-दर भटकते फिरते कितने परिजनों की तलाश में
मलबों में चलती सांसें हुईं खामोश किस कदर हताश में
मटियामेट हुए तेरे सैलाब में सैकड़ों ठिकाने ,आशियाने
अटूट श्रद्धा के बदले भक्तों के साथ हुए कैसे कारनामे ।
                                                              शैल सिंह