Thursday, 13 December 2012


''संजीवनी''


आज हृदय के द्वार पर हलचल
मैंने नीर भरी आँखों से देखा
पथ पर जाते एक बटोही को
प्रिय के बिल्कुल रूप सरीखा ।
सिमट गया आँचल में आकर
पानी मान सरोवर का फीका
देखो प्रणय के मुझ जैसे मतवाले
मोती सी झर-झर गंगाजल का ।
डाली पर इतराती कलियाँ जो
रवि की किरणों में खिलती हैं
दुःख दर्द किसी के जीवन का
वो मुस्काती अधरों से कहती हैं ।
सुमनों के प्रेमी हे भ्रमरा तुम
उनकी भावों को भी पढ़ लेना
जो मूक कहानी कहती हों उनके
प्रियतम से दूर देश में कह  देना ।
शब्दों में बिखराकर अन्तर गाथा
शिलाओं की सतह पर लिखती हूँ
पथ जाने वालों बतलाना उनको
सपनीले विश्राम गेह को चलती हूँ ।
निर्भय मृत्यु की मुझ पर महिमा
उसके तुमुल गर्जन से डरती हूँ
पर सांसों के विश्रीन्खल पल में भी
मौत को संजीवनी दिया करती हूँ ।