Saturday, 29 October 2016

तमस मिटाऐं अंतर्मन का



कहाँ दीपक की दीपशिखा में दंभ तनिक भी बोलो तो
कहाँ दीपक के प्रज्वलन में है अहं तनिक भी बोलो तो ,

पर्व ज्योति का आया दीप बाल करें सिंगार तिमिर का
अन्तर्मन के तज विकार आओ करें सिंगार तिमिर का ,

मावस की काली रजनी जगमग वर्तिका की ज्योति से
आलस्य,कुंठा,भय,निद्रा मिटे दीप की अमर ज्योति से ,

चेतना का द्वार खोलता माटी का दीप जला अपना तन
अज्ञानता का तिमिर मिटाता दीप लुटा कर अपना धन ,

आकाश जुगनूओं से जगमग दीपों से झिलमिल धरती
साहित्य ,कला,संस्कृति ,ज्ञान दीपशिखा उरों में भरती ,

निज की आहुति दे नित दीपक पथ आलोकित करता
स्वर्ण शिखा सी ज्योति बिखेर संसार सम्मोहित करता ,

दीप जलाएं शिक्षा का मानवता का ऊर्जा भाईचारे का
नेह के घृत में चेतना की बाती तम मिटाऐं अंतर्मन का ,

अन्तर्मन की भावनाएं,संवेदनाएं प्रज्वलित करें प्रकाश
अभिव्यंजना दीप की तब सार्थक जब हिय भरें उजास ,

हमारी संस्कृति के रंग-रंग रचा-बसा दीपों का त्यौहार
आत्म ज्योति दीपित कर मनुज घर मन्दिर दियना बार ।

                                                    शैल सिंह