Sunday, 25 September 2016

'' क्रन्तिकारी कविता ' रण में विजय केतु फहराने पर

'' क्रन्तिकारी कविता ' रण में विजय केतु फहराने पर

ये आक्रोश भरे शब्द लिखे हैं आंख पानी से
रोष है उड़ी में हुए अट्ठारह वीर जवानों की कुर्बानी से ,

रण हुंकार से भरी शेरों की शमशीरें दहक रही हैं
बिफ़र रहीं तलवारें भी भुजायें-भुजायें फड़क रही हैं
हर वजूद के रक्त प्रवाह से सिंह सी गर्जनायें भड़क रही है
विकराल तूफान की लहरें लीलने के लिए पाक तुझे ललक रही हैं

हम आस्मा को धरा पर झुका लेने की ताकत रखते हैं
तोड़ पर्वतों का गुमां गंगा बहा लेने की हिमाकत रखते हैं
हमारी एक ही हुंकार जला के खाक कर देगी पाकिस्तान को
हमारे हिन्दुस्तानी स्वेद में दुनिया बहा ले जाने का दुःसाहस रखते हैं

माँ मलिन मन मत करना वीर पूत के शीश कटाने पर
गर्व से सीना तान के रखना रण में विजय केतु फहराने पर
धरा का शीश नहीं झुकने देंगे अरि भी नत मस्तक करेगा अब
देखना माँ रण बांकुरों के कर में देख खंग विश्व भी काँप उठेगा अब

बांध शहादत का सेहरा माँ गर वीरगति भी हो जाये
मातृभूमि की रक्षा ख़ातिर माँ मेरा नाम अमर गर हो जाये
धन्य मानूँगा ये जीवन,धरती ऋण से प्राण उऋण गर हो जाए
सौभाग्यशाली वो दिन होगा क़फ़न तिरंगा ओढ़ चिता गर घर जाये ,

माँ ने कोंख से जनम दिया भारत माँ को सौंप दिया
कैसी हिम्मत वाली माँ फ़र्ज की ख़ातिर कुलवंश सौंप दिया
योद्धा पत्नी ने जीवन सुहाग का आभूषण धैर्यवान हो सौंप दिया
मैं कितना किस्मत वाला वतन लिए निश्चिन्त सांस-सांस है सौंप दिया
,
ऐसा सिंघनाद करना है,तहलका विश्व में मचाने को
काई रक्त की साफ है करना कायरों की जड़ें हिलाने को
अब कोई संवाद न होगा बस होगा इंकलाब दिल दहलाने को
भटकी तरुणाई में रसायन ऐसा घोलना नपुंसकों का होश उड़ाने को ।

शैल सिंह