Tuesday, 13 August 2013

'' यादों का झरोखा '

शामे गम करार हो बहल जाये जिंदगी 
संवर जायें सफर तन्हा चहक जाईये ,

पीर पागल बनाये सताए बहुत याद 
बन के झोंका हवा का गमक जाइये 
कितनी मायूस है जिंदगी आप बिन 
बन के जुगनू गली में चमक जाइये ,

इक तमन्ना है दीदार की बस सनम 
नूर आँखों का  बन के झलक जाइये 
इक  बोसा  राहत का दिल को मिले 
रस मिले होंठ को बस छलक जाइये ,

भोर के स्वप्न सा देखे मंजर नयन 
ख़्वाब  की बांह में आ चहक जाइये 
मन की सूनी हवेली है  अरसा हुआ 
मुस्कुरा उठे गुलिस्ताँ महक जाइये ,

गैर महफिलों की रौनक बढ़ाते रहे 
बज्म आकर मेरे भी बहक जाइये 
ग़मे बीमार की सुन शाम-ए-गजल 
चन्द लमहा सही ही  ठमक जाइये ,

दर्द के हाथों बेच खुशियाँ रोई बहुत 
घटा बनके पलक पर अटक जाइये 
आज गुजरे ज़माने का वास्ता कसम 
बेताब बांहों का दायरा भटक जाइये ,

दर्द-ए-गम लेते अंगड़ाई करवट बदल
बेज़ार पहलू लरज कर  सहक  जाईये
खुद  को रखा  भुलावे  में है अब तलक
दास्ताँ दिल की सुन कर अहक जाईये ,

बेचैन आहों को ढाढ़स मिले कुछ  घड़ी
दिल की गुमसुम गुफा में लहक जाईये
जान ले  ले ना  जालिम  ख़ामोशी कहीं
शिकवा  आँखों  की  कोरों ढलक जाईये ,

जवां ख्यालों की महफ़िल सजी है प्रिये
हसीं आलम का लुत्फ ले सनक जाईये
ज़िन्दगी के सुमन हैं मुरझाने लगे अब
मन विज़न बन के भौंरा भनक जाईये ,

बेज़ार --विकल