Tuesday, 13 August 2013

महा नगर की एक झलक 


कैसा  ये महानगर  अजीब   इसकी दास्ताँ
ना  किसी  से  दोस्ती ना  किसी  से  वास्ता
ना  किसी से गल्प   कोई ना किसी से वार्ता
अजब सी आपाधापी बस पैसा रिश्ता नाता ,

बहुमंजिली  इमारतों  में  दुनिया  सिमट  गई
कबाट बन्द खिड़कियों में जिंदगी अटक गई
कोंतड़े सी बालकोनी में क्या क्या लटक गया
बित्ते भर के बारजे पर सब कुछ ठिठक गया ,

कहते शान से बी.एच.के. महंगा है बड़ा दाम
महल  लगे  ना हवेली अपार्टमेंट  फ्लैट  नाम
इससे  ईतर तो  मुर्गी का दड़बा  कहीं बेहतर
फ़ितरत तेरी इंसान हाय कबूतर से भी बदतर ,

अंगना नहीं कि तुलसी का चौरा बना सकें
फुदक   रही   हों  गौरैयें  दाना  चुगा  सकें
दूध भात का कटोरा ले  लालच से बुला के
छज्जा  नहीं  मुंडेर  कि  कागा  उड़ा  सकें ,

कोठा नहीं अटारी निशां मोनियाँ काश का
हिफाजत से रखें आजी का संदूक काठ का
इतने  सहन  में  घूरों का  साम्राज्य  गाँव  में
यहाँ संम्हल के चलूँ ठोकर लगते हैं पाँव में ,

रिश्तों भरा परिवार है पल पल दरक रहा
न्यूक्लियर परिवार  का  चलन है  बढ़ रहा
पुस्तैनी बाप-दादा की विरासतें है ढह रहीं
वक्त की आंधियों में पंगु  इन्सान बह रहा ,

अजनवी  लगें  यहाँ  जाने-पहचाने  लोग भी
त्यौहार ,पर्व  बेमाने , बेमानी  लगे  सोच  भी
कहाँ वे छप्पन भोग कहाँ व्यंजनों की खुश्बू
फास्टफूड,मैगी.पास्ता पर स्वाद हुआ लटटू

फर्नीचरों में तब्दील जंगल और बाग़ हो गए
उजड़ रही हैं बस्तियां शहर आबाद हो गए
बुलबुलों की वाटिका लानों की शान हो गयीं
पक्षियों का कलरव वाहनों की खान हो गयीं ,

चित्रों में  दिखती बस महादेवी की गिलहरी
कहाँ खेत औ खलिहान जहाँ बोले टिटहरी
उंगलियाँ जो पकड़ती थीं तितलियाँ जुलाहे
अब वो माउसों से खेलतीं टी.वी, पर निगाहें ,

अब पपिहरा की पिक कहाँ चाँद की चकोरी
सखी से कहाँ पाती  अब लिखाती कोई गोरी
अब कहाँ विरहन कोई जो छुप के चोरी चोरी
डाकियों की झरोखों से देखें साँझ भोरे खोरी ,

कभी झुरमुटों के पीछे पिछवाड़े का ठिकाना
मनचली का प्रिय मिलन का होता ये बहाना
शर्मोंहाया का पर्दा आज आँखों से गिर जाना
यहाँ रास खुलेयाम कितना बेशरम जमाना,

कैसा है ये महानगर ……।

मोनियां काश का --सरपत,मूंज का बना हुआ ढक्कन वाला मोना ,
                                        सिंगार का  रखने का पिटारा