Friday, 31 May 2013

भ्रमजाल

   

रात रुपहली होती वो तारों वाली
आसमांन चाँद जवानी से भरपूर 
कभी इश्क चढ़ाया परवान मेरा                                                                           
उसका कुंदन सा स्पर्शों का नूर।

सांसों की लय मद्धम होती जाती
जब प्यार-मिलन का होता संगम 
विहंस बाहुपाश कभी जो भरते वो 
दे देता था सहरा भी साथ विहंगम। 

बिन कहे जुबां से अंतर्मन की बातें
अँखियाँ जाने क्या-क्या कह जातीं 
मेरा शर्माना मन्द मुस्काना उसका 
आहिस्ता ओढ़नी गिरती बल खाती । 

छितरा जाती मुख पर घोर उदासी 
कह अलविदा विलग जब होते हम
भोर किरण में चाँद तारों वाला भी 
अलग पुनः ख़्वाब भी बुन लेते हम ।

तब एक झलक बस पा जाने को
दिल बेचैन बेक़रार सा रहता था
लो इंतजार अब ख़त्म हुआ जब
दूर से देख उन्हें दिल कहता था।

पर इन आँखों को धोखा हुआ या
हो गयी थी मैं हतप्रभ देख नजारा
संग गलबंहियां डाले गैर कोई थी
बांहें जो कभी होती थीं हार हमारा।

गम भी ख़ुशी कि, हकीकत से रूबरू
सूरत की असलियत शर्मिंदगी देगी
क्या पता था अजीब सफर मोहब्बत        
कभी दर्द का सिला ये जिन्दगी देगी। 
                               
                                                  शैल सिंह