Saturday, 23 March 2013

मेरी पहचान 'शैल शिखर' सा

गर  दे  न  सको  मान  तो  अपमान ना करो
खुद  के  सस्ते  नाम  पर  अभिमान ना करो । 

मैं कोई   नामचीन  हस्ती  की आवाज नहीं हूँ
फिर भी  किसी परिचय का  मोहताज नहीं हूँ
गीत,ग़जल  बस  शगल  मेरा अंदाज  यही हूँ
'शैल शिखर' सी हूँ  शैल  बस आगाज यही हूँ ।

दर्द-ए-ग़म  ढाल  गीतों  में  मैंने  है  गा  लिया
इस तरह नई  दुनिया मैंने खुद की बना लिया
जब-जब  किसी ने भेंट की तौहीन की सौगात
दिल में ज़ज्ब कर  उसे मैंने गज़ल बना लिया । 

क्यों चश्में-नम हुई,का राज क्यों हैं आप पूछते
आप की  ही  दी सौगात  फिर क्यों  बात पूछते
पूछना  ही  है  तो  रख  के  दिल  पे हाथ पूछिए
क्यों  ऐसे  हँसते  हुए  दुखते  हैं  लम्हात पूछते ।

जला के दिल का दीप घर में रौशनी है कर लिया
सब पूछते क्यों सारी रात 'शैल' जलता  है दीया
जिस तरह  शमा ये रात  भर जल कर जलाई  है
जानती हूँ साथ जल मेरे सारी रात रोया है दीया ।

क्यों   बार-बार   क़त्ल   मेरे  ऐतबार  का   हुआ
दिल  पर   कभी असर  ना  इख़्तियार  का हु आ
क्यों  चमन  को  लूट जाते चमन  के  बहारां  ही
कैसा हाल साहिलों पे कश्ती के पतवार का हुआ ।  

                                                                 शैल सिंह