Tuesday, 22 January 2013

नारी जागृति के लिए

                  ''दिल्ली के मौजूदा हालात पर''

कर इतनी बुलंद आवाज घूंट अपमान का अंगार बरसाये,
सहनशक्ति सीमा तोड़ दुर्गा का विकराल अवतार अपनाये,
विद्रोही अभियान विभत्स व्यभिचार का वाकया न दुहराये,
विकृत सोच का मिटा तम अस्तित्व की आ जयोति जलायें।


ऐसे कामान्ध पुरुषत्व पर लानत जो काबू में ना रखा जाये,
किसी रक्षक का ऐसा हश्र हो फिर कभी  सोचा ना ये जाये,
इतना क्षत-विक्षत करो अंग कि दुस्साहस तार-तार हो जाये
बेमिसाल तस्वीर ऐसी पेश कर जग सारा शर्मसार हो जाये,
दिखा  अंतर्द्वंद की  वहशत  दरिंदों को  भी आगाज हो जाये,
कि क्या हस्ती हमारी भी संसार में अजूबा अंदाज छा जाये।
कर इतनी बुलंद ......। 


क्यों अग्नि परीक्षा दें हमीं क्यों चीरहरण हमारा सरेराह में,
हम अल्पवसना हों या परदानशीं या चलती अकेली राह में,
युवती,किशोरी,बालिका या प्रौढ़ा अकेली कहीं रात स्याह में,
कोई कौन होता है रेखाएं खींचने वाला हमारी हसीं चाह में,
ऐसा कर कि पाबन्द मीनारों की वो सारी दीवार ढह जाये,
अन्यथा कहीं आक्रोश कहर ना बरपाये हाहाकार हो जाये।
कर इतनी बुलन्द……। 


सुन्दर रचना भगवान की पावन माँ,बहन,भार्या हम बेटियाँ,
शालीनता,सहृदयता को कोई समझे ना हमारी कमजोरियाँ,
वक्त का यही तकाजा विकृत मानसिकता बदले अब दुनियाँ
वर्जनाओं का तोड़ विद्रूप पहरा कर स्वतन्त्र पाँव की बेड़ियाँ,
खुद का वर्चस्व करो कायम पुरुषों के समकक्ष नाम हो जाये,
तब्दीली नजरिये सोच में मर्दों के हो भष्म तकरार हो जाये।
कर इतनी बुलन्द……. । 

क्यों इज्जत का ठीकरा हमेशा सिर्फ हमारे ही सर मढ़ा गया
क्यों हमारी ही निधि को संरक्षण का मोहताज बनाया गया
त्याग समर्पण की बन मूरत यूँही न बस छलती रहो खुद को
आबरू पर लगी खरोंचें सदा रहेंगी नासूर बनी बेंधती तुझको
कुछ ऐसा कर वहशियों के जिस्म की तप्त गर्मी झुलस जाये
लगा दो नापाक इरादों में आग दामन कोई दाग न रह जाये।
कर इतनी बुलंद ..........।